मायका याद आता है मुझे.....

लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जनसम्पर्क विभाग को देखकर एक ही गीत याद आता है, ‘हम तो चले परदेस, हम परदेसी हो गए’| सच मानिए ये कोई मजाक नहीं, सच्चाई है एमजेएमसी की मार्कशीट लेने के बाद वहां जाने के बहाने तलाशने पड़ते हैं| बहाना मिल भी जाए तो वहां पंहुचते ही सब पूछने लगते हैं, ‘बिटिया किसी काम से आई हो क्या?’ अब क्या कहूं उनसे के पांच साल का जुडाव यूंहीं खत्म नहीं होता| जब भी ऐसा सवाल उठता है लगता है जैसे शादी के बाद ससुराल से अपने मायके आ रही हूं, इसलिए मुहल्ले वाले कानाफूसी कर रहे हों, ‘जब देखो तब आ जाती है मायके, लगता है मामला कुछ गडबड है|’ काश कोई दिल की बात समझ पाता कि काम तो बस बहाना है, बस जब दिल करता है चल पड़ते हैं अपने मायके की तरफ| कहते हैं न जब तक शादी नहीं होती तब तक घर से दूर रहना नहीं खलता लेकिन उसके बाद जैसे इंतज़ार में दिन गुजरने लगते हैं|
मुकुल सर 
इस मायके में बहुत बडी फैमली है मेरी| हमारे सर जी मुकुल श्रीवास्तवा (जिनके बिना नहीं चल सकती बच्चों की स्मूद लाईफ), हमारे महेश भैया (कभी-कभी डाटते भी हैं), दीक्षित सर (हिंदी की छोटी-छोटी बातें सिखाते हैं), अनवर सर (फोटोशॉप कर देते हैं सबको), नवाज़ सर (एक महीने के लिए आए लेकिन छा गए), रोहित सर (संविधान पढाने का जिम्मा था), पांडे सर (शयद जिनकी क्लास मुकुल सर के बाद सबसे ज्यादा पसंद आई), सेठ सर (जिन्हें सभी बहुत परेशान करते हैं), मेरे बहुत प्यारे दोस्त और भी बहुत से लोग जिनके मैं शायद नाम नहीं जानती लेकिन पहचानती जरुर हूं| इस परदेसी फिलिंग में अच्छा ये है कि आज भी डिपार्टमेंट के लोग पहचानते, वरना तो भगवान जाने कोई पूछ ही ले, “कौन हो भैया?” खैर, शुक्र है भगवान का अपने साथ ऐसा नहीं है| कम से कम पहचान लेते हैं मायके वाले, अब तो दोस्तों की लिस्ट थोड़ी और लम्बी हो गई है| हमारे बाद जो आए उनमें से भी कुछ लोग हाय-हलो करने लगे हैं, मतलब मेरा संयुक्त परिवार थोड़ा और बड़ा हो गया है|
पेड़ की छांव में गुफ्तगू 
एक दिन पहले गई थी अपने मायके, काम बहुत छोटा था लेकिन छोटे काम को बड़ा बनाने का हुनर सीख लिया है| फोन भी किया जा सकता था लेकिन मन था एक बार फिर उस जगह को देखने का जहां से शुरू किया था अपना एक नया सफ़र| बस उम्मीद लगी रहती है कि इस बार जाऊं तो कोई पुराना दोस्त मिले जिसके साथ फिर से उन्हीं सीढियों पर बैठकर चाय पी सकूं| एक बार फिर उन्हीं यादों के समन्दर में गोते लगाते हुए ‘एक प्याला मिठास का- पार्ट 2’ लिख सकूं लेकिन इन पांच सालों में बहुत कुछ बदल गया है| तोताराम कैंटीन की जगह अब नेस्कैफे ने ले ली| अब बहुत कम लोग हैं जो चाय की चुस्कियां लेते नज़र आते हैं अब तो कोल्ड कॉफी के शौकीन दिखाई पड़ते हैं| समोसों और वो हमारे फेवरिट एक रुपये के खुले बिस्किट की जगह मैकरोनी, मैगी ने ले ली है| सारे गिले-शिकवे, सारी गुफ्तगू पेड़ के नीचे नहीं छतरी के नीचे होती हैं| कितनी बेत्तुकी बातें किया करते थे हम, अब तो जैसे समझदारों की जगह बन गई है वो| सब बड़े होना चाहते हैं बचपना दिखाने में शर्म सी आने लगती है| हम तो अब भी जाकर अपना बचपना दिखाने लगते हैं, अच्छा लगता है| बेकुफी की बात करो तो सर जी अपने उसी पुराने स्टाइल में बोलते हैं, ‘बच्चे अब तो बड़े हो जाओ, कब बड़े होगे’| अब क्या बताएं सर जी को कि सर जी फील गुड होता है|
याद आते हो दोस्तों 
वैसे ये चाय इसलिए भी याद आ गई क्योंकि मामी जी आई हुई हैं हमारे घर| अरे वही, जिनके बारे में बताया था चाय वाली कहानी में| शुगर के चलते चाय से अलगाव हो गया है उनका, तो थोड़ा दुखी हैं| भई, किसी कुमाऊँनी के लिए ये किसी सजा से कम नहीं और वैसे भी उन्हें तो लोटा भरकर चाय पीने की आदत थी| उनकी दयनीय स्थिति देखकर बुरा लगता है और डर भी कि कहीं मुझे अपने पहले प्यार से ब्रेक-अप न करना पड़े| वैसे ही वक्त के चलते 25 कप चाय 15 कप तक सिमटकर रह गई है| खैर, मुकुल सर जी के शब्दों में ‘रायता थोड़ा फ़ैल गया है’ तो बैक टू स्टोरी, बात हो रही है मेरे दूसरे मायके की| बहुत प्यारा है मेरा मायका, ख़ास ये कि हर टाइप का सदस्य फिट हो जाता है यहां| याद है मुझे अपने वो शब्द जब मैंने कहा था कि हम यादों का घरोंदा बना रहे हैं|

चाय की चुस्कियां, वो समोसे जिन्हें न खाने की हम रोज
वो पहली बार जब हम मिले 
कसमें खाते थे, इन छोटी छोटी बातों ने दिल में जगह बना ली| आज भी याद है वो दिन जब एक गज़ल सुनते सुनते अनमता रो पड़ी थी, नाराज़ थी मुझसे| कुछ बोल नहीं पाई और मैं भी मजाक मजाक में कुछ ज्यादा ही छेड गई, बस छलक पड़े आंसूं| कुछ बहुत ख़ास यादें जुडी हैं उन सीढियों, उन पेड़ों और उस विभाग से|
पांच सालों के सफ़र में मिले बहुत सारे दोस्त, प्यारी यादें, दिल में घुली हुई मस्ती, जिंदगी के सही मायने| बीते हुए कल का यह सफर रह-रह कर याद आता है, अगर भुलाना चाहूं तब भी दूर नहीं जाता, बस कुछ पलों के लिए दिल के किसी कोने में छुपकर बैठ जाता है और मौक़ा मिलते ही दोबारा सामने आ जाता है| कुछ गोल्डन डेज़ कभी लौटकर नहीं आते बस यादें याद आती हैं| ऐसा ही है मेरा दूसरा मायका और इस मायके से जुड़ा मेरा सफ़र| बस चाहती हूं अब वहां जाने के बहाने न ढूँढने पड़े|

19 Responses so far.

  1. rk mishra says:

    to kya aap abhi sasural men hai mam

  2. neha says:

    bht khub.... 5 saalo ko itne shabdon me achi trh sametne ki koshish ki gyi h..
    unforgettable days....

  3. bahut accha likha hai...dil se

  4. abhi to nahin... comment k liye shukriya sir

  5. एक न एक दिन हर लड़की को अपना मायका छोड़कर जाना ही पड़ता है, तुम्हे ससुराल में इतना प्यार मिले कि मायके की याद ही न आये.....

  6. मायके की कभी ना याद आये ससुराल इतना प्यार मिले.....गुड़ लक...

  7. badiya likha hai... bas hum umeed karte rhe ke kuch naye doston ke naam bhi inme judey honge.. par khair... koi nahi.. keep it up!

  8. bilkul jude hain naam.. shukriya

  9. Very nice...Dil ke karib...'Mayaka' word for campus really very innovative thinking...mujhe bhi yaad aa gaya 'Mayka'..

  10. ज़िंदगी की उलझने शरारतो को कम कर देती है और लोग समझते है की हम बड़े हो गये .. aur yaad ka daur ko bada hi ajeeb kabhi bhi chala aata hai ..nice one tiwari ji

  11. Sunil Sri says:

    kasam se yaar......tm writer ban jao aur dekhna tmhre articls to gajab kar denge....keep it up....my all best wishes r with u....

  12. Dost tera koi jawab nai... :)

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