आज़ाद दुनिया के ख्वाब देखता यंगिस्तान

मेरा रंग दे बसंती चोला माई रंग दे..... याद है यह गीत? यह सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि भावनाओं का सागर है जिसमें देश के लिए प्यार मिला हुआ है| 15 अगस्त 2012  को हमने अपनी और अपने देश की आज़ादी की 66वीं वर्षगाँठ मनाई| दिल में उमंग, जोश और देशभक्ति की भावना एक बार फिर हिलोरे मार रही थी| एक बार फिर जुबां पर “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” जैसे नारे सुनाई देते हैं| 15  अगस्त एक ऐसी तारीख जिसने हमें हक दिया स्वतंत्र कहलाने का, वह दिन जो याद दिलाता है कुछ जाने-पहचाने नाम और कुछ गुमनाम नाम जिन्होनें हमें स्वतंत्र भारत में सांस लेने क अधिकार दिलाया| इस खास दिन याद आते हैं- राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे आज़ादी के मतवाले| याद आते हैं भारत माँ के वह सपूत जिन्होनें इस आज़ादी को पाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, उस आज़ादी के लिए जिसे शायद वह भोग भी नहीं सके|
इस आज़ादी के लिए जान गंवाने वाले यह महान सपूत अपने जीवन को पूरी तरीके से जी भी नहीं पाए| किसी ने अपने माता-पिता को बिलखता छोड़ा तो किसी ने अपनी नई नवेली दुल्हन को| आज़ादी के इन मतवालों ने अपनी राह में बिछे काँटों को भी नकार दिया और चल पड़े उस राह पर जहां मौत उनकी प्रेमिका बनकर अपनी बाँहें फैलाए खड़ी थी| हर साल 15 अगस्त को इन मतवालों की याद में देशभर में कार्यक्रम किये जाते हैं, देश भक्ति के गीतों की गूंज हर गली हर मोहल्ले में सुनाई पडती है| हाथ में तिरंगा लिए छोटे-बड़े झांकियों के साथ “भारत माता की जय, भगत सिंह-चन्द्रशेखर अमर रहें” जैसे नारे लगाते हैं| ऐसा लगता है मानों हम उस वक्त में पंहुच गए हों जहां आज़ादी ही हमारा एकमात्र ध्येय है लेकिन हर बार इस खुशी के अवसर पर सबसे बड़ा सवाल जो दिमाग में अपनी जगह बनाने लगता है वह है कि कल तक देश की आज़ादी की आस लगाए हम आज किस तरह की आज़ादी की आस लगाए बैठे हैं? 
झंडारोहण के लिए स्कूल जा रहे बच्चों पर अचानक नज़र पड़ते ही याद आने लगते हैं बचपन के वो दिन जब कभी हम भी यूँही हाथ में तिरंगा लिए स्कूल की तरफ बढते जाते थे| एक अजब उत्साह महसूस होता था, एक अजब खुशी झलकती थी उस वक्त, एक एहसास था जिसे न समझते हुए भी हम उसका लुत्फ़ उठाते थे| आज इन बच्चों को देखकर याद आता है कि आज वक्त बदल गया है, हम बदल गए, हमारी आज़ादी की परिभाषा बदल गई, इतनी फुर्सत ही नहीं कि इस मतवालेपन के साथ मस्ती में तिरंगा लिए झांकियों में शामिल हों सकें| अचानक दिमाग में एक विचार कौंधने लगता है कि कुछ वक्त बाद यही बच्चे समाज से, अपने माता-पिता से अपने वजूद, अपने विचारों की स्वतंत्रता की मांग करने लगेंगे| कुछ सालों बाद इनके लिए आज़ादी के मायने भी बदल जाएंगे| 
आज़ादी के इतने सालों के बाद सिर्फ जीवन जीने की शैली ही नहीं बल्कि हर बात के मायने बदल गए हैं| जहां पहले देश को आज़ाद कराना ही एकमात्र ध्येय था वहीं, आज खुद की आज़ादी और अपने विचारों की स्वच्छंद दुनिया ही एकमात्र ध्येय बन चुकी है| युवाओं को पैसा, समाज में अलग जगह, दूसरों से अलग दिखने की चाह ने अपने मोहपाश में बांध लिया है, वह अपने माता-पिता के बंधन में तो नहीं रहना चाहते लेकिन भौतिक वस्तुओं के प्रेम ने उन्हें किस-कदर जकड लिया है इसका आभास खुद उन्हें भी नहीं है| अब तक स्कूलों-कॉलेजों में रहने वाले इन युवाओं की जिंदगी यहाँ से निकलकर बार और पबों तक सिमट गई है, रही सही कसर फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने पूरी कर दी है| खुद को मॉडर्न कहने वाले इन युवाओं को वास्तविक दुनिया में जीने से ज़्यादा अपनी आभासी दुनिया में जीना रास आता है| गुची, ब्लैकबेरी जैसे बड़े ब्रांड इनकी पसंद में शामिल हो चुके हैं, इससे नीचे इन्हें कुछ मंजूर नहीं| 
वित्तीय रूप आत्मनिर्भर आज़ाद भारत के यह आज़ाद युवा किसी भी उत्पाद पर बेरोकटोक खर्च करने के लिए तैयार हैं| अबतक जहां भारतीयों का मूल मंत्र “बचत-बचत-बचत” था वहीं, आज के युवा का मूल मंत्र है “खर्च-खर्च-खर्च|” यह भारतीय युवा नए आईपॉड, ब्रांडेड सनग्लासेज, सेलफोन, अपार्टमंट या कार पर खर्च करने और सुपर-ट्रेंडी कहलाना बेहद पसंद करते हैं| इनके लिए मायने नहीं रखता कि कौन सी चीज़ कितनी मंहगी है, यह अपनी ही दुनिया में रहते हैं| हालांकि, अपनी अलग पहचान के लिए संघर्ष कर रहे इन युवाओं में बहुत कुछ ऐसा है जो इनकी एक जिम्मेदार नागरिक और भावनात्मक व्यक्ति के रूप में पहचान कराते हैं| किसी भी तरह के आंदोलन को इन युवाओं का भरपूर सहयोग मिलता है| भले ही इनकी एक दुनिया पब तक सिमटी हो लेकिन इनका मन कहीं न कहीं अपने अस्तित्व की तलाश में लगा होता है|
बाहर से मनमौजी, स्वछंद, गैर-जिम्मेदार नजर आने वाले यह युवा आज भी अपने अस्तित्व, अपनी पहचान, अपने विचारों की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं| बस वक्त के साथ इन युवाओं के चेहरे बदल जाते हैं| सपनों की डोर से बंधी इन युवाओं की उम्मीद हर दिन अपनी आज़ादी की मांग करती है| इनके सपनों की उड़ान बहुत ऊँची है, जिसे पूरा होने में अभी थोड़ा वक्त तो लगेगा ही|

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11 Responses so far.

  1. Mukul says:

    बहुत अच्छा लिखा है भावना बड़े दिनों बाद आपकी पोस्ट पढ़ी अच्छा लगा बधाई

  2. bahut accha socha hai aapne ...

  3. NIKHIL says:

    bahut sahi baat likhi hai, lekin sayad ab youth fashion & show me apne AIM se kahi koso dur ho gye hai.shayad azadi hi hamari sabse badi kamjori ban gyee hai........

  4. सचमुच भावना जी ..इस मनमौजीपन के पीछे ..अस्तित्व की तलाश जारी है ..कुछ बाकी है ..कुछ हौसला है .. वक्त तो लगेगा ही|

  5. Bhawna you select a very interesting topic but either saying it good , interesting or awesome .. this is going to be big problem in future for our next generation . Aazadi to naam matra ki hi rah jayegi kewal Mein , Mein aur kewal Mein hi rah jayega ...hume ish Mein ki problem se bahar nikalna hoga so we get a rising india

  6. @mukul sir: thank u sir...

  7. post pdhne ke liye shukriya @ashish (rishi) sir

  8. vichar rkhne ke liye shukriya @nikhil

  9. baat to aapki bhi sahi hai @sujit ji

  10. @anshu joshi: thanx alot for ur precious comment frnd

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