खुशियों की छांव में छुपा मन का अंधेरा

छुपा मन का अंधेरा
राह पर अपनी ही धुन में मस्त बच्चों को देखकर लगता है कि ज़िंदगी बहुत आसान है. कुछ समय बाद जब यही बच्चे अपनी मंज़िलों की तरफ कदम बढ़ाते हैं तो इन्हें भी उस तपती धूप का एहसास होने लगता है जिससे हम उस वक्त  होते हैं. अक्सर ज़िंदगी में ऐसे पल आते हैं जब हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता, लगता है जैसे हमें वो सब कुछ हासिल हो गया है जिसकी हमें तलाश थी. कुछ वक्त बाद ही हमारी गलतफहमी से पर्दा उठता है और एहसास होता है कि शायद सब कुछ वैसा नहीं है जैसा नज़र आ रहा है.
रिश्ते, स्वाभिमान, ज़रूरत और वास्तविकता किसी न किसी मोड़ पर सामने आकर खड़ी हो ही जाती है.जैसे खुशियों की छाँव में मन के किसी अँधेरे कोने में बैठा डर, झिझक और निराशा की लकीर सामने आकर खड़ी हो जाती है. बिलकुल फ़िल्मी स्टाइल में कभी 'प्यार हुआ, इकरार हुआ' की तर्ज पर सारी हकीकत सामने आकर खड़ी हो जाती है. कोशिश रहती है कि किस तरह आप खुद को उस सच्चाई से दूर रख सकें लेकिन अपनी ही हकीकत से भाग पाना आसान नहीं. वो डर, वो निराशा बांहे फैलाए सामने आकर खड़ी हो जाती हैं. जैसे आपने उससे कोई उधार लिया हो. समझ ही नहीं आता कि ऐसा क्या है जो हम इससे बाहर ही नहीं निकल पा रहे.
एक ऐसा समय जब आप अपनों के पास तो होते हैं लेकिन मन में चल रही उधेड़ बुन आपको उनके अपनत्व और प्यार का भागी बनने ही नहीं देती. न ही आप अपने मन की बात को उनतक पंहुचा पाने में सक्षम होते हैं क्यूंकि उनके अनुसार आप अपने जीवन से बेहद खुश हैं. वो भी खुद को आपकी इस ख़ुशी का भागी मानते हैं और उत्स्व की कोई कमी महसूस नहीं होने देना चाहते। ऐसे में न ही वो हमको इस ख़ुशी नाम की मृगमरीचिका के मोह से बाहर निकाल पाने में सक्षम होते हैं, न ही हम मन में उठ रहे तूफ़ान के बारे में कोई बात कर पाते हैं. बस इस एक घुटन की वजह से शुरू हो जाता है एक नया खेल, जहाँ आप अपने ही लोगों को तकलीफ से बचाने के लिए खुद को तकलीफ देने से भी गुरेज नहीं करते. कहीं रिश्तों की उलझी बात, तो कहीं आगे बढ़ने की बेतहाशा दौड़, बस खुद से सच्चाई से बच निकलने का एक बहाना मात्र लगता है.
छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए हम कई बातों की अनदेखी कर देते हैं और जब यही अकेलापन सालता है तो हम खुद को समझाते हैं कि हम खुश हैं. शायद ऐसा होता भी है लेकिन सिर्फ सामने से देखने वाले शख्स के नज़रिए से. सच्चाई इससे कोसों दूर होती है, नाम और काम के चक्कर में हम अपनों से दूर हो जाते हैं और इस बात का एहसास हमें तब होता है जब हमारे वो अपने हमसे दूर चले जाते हैं और हमें लगता है कोई तो होता जिससे हम अपने दिल की बात कर पातेवक़्त के साथ-साथ हमारी जिम्मेदारियां बढती हैं और हमारी जरूरतें बदल जाती हैं पर कुछ जज़्बात जो वक़्त की आंधी में दिल के किसी कोने में दफ़न हो जाते हैं वो. एक दिन यूँही अकेले बैठकर याद आ जाते हैं वो दोस्त, वो पल होठों पर मुस्कुराहट और आँखों में आंसूं दे जाते हैं. चाहे कोई कितना ही कह ले उसे फर्क नहीं पड़ता लेकिन सच्चाई यही है कि फर्क पड़ता है और दिल की गहराईयों से जज़्बात की जो लहरें उठती हैं उन्हें रोक पाना नामुमकिन होता है.
दिन के किसी भी पहर में मन में  का वो अँधेरा सामने आ ही जाता है और फिर शुरू हो जाती है उस डर से खुद को दूर करने का जतन. कभी-कभी तो मन में आता है कि काश, सबकुछ छोड़कर जाने की हिम्म्त होती तो शायद किसी पहाड़ की चोटी पर धूणी रमाए बैठे रहते या बस यूंही सन्यासियों की तरह भ्रमण पर निकल जाते. लेकिन कहते हैं न मन की निराशा को रोकना आपके बस की बात नहीं, ये तो कंही भी, कभी भी बिना बताए घेर लेता है. न जाने ये खुशियों की छांव के बीच छुपा बैठा मन का अंधेरा कब दूर होगा?

14 Responses so far.

  1. Hmm. dost shayad akelapan hota hai sab k dil me kahi na kahi . kisi kone me.

  2. Who is more foolish, the child afraid of the dark or the man afraid of the light?

    Turn your face to the sun and the shadows fall behind you...Just Cheer Up !!

  3. बहुत खूबसूरत

  4. छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए हम कई बातों की अनदेखी कर देते हैं और जब यही अकेलापन सालता है तो हम खुद को समझाते हैं कि हम खुश हैं.
    सुन्दर लिखा है बधाई

  5. depends.. thank u for comment

  6. वाह... उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

  7. thank u @manish pandey sir

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