क्या.. वो बर्तन धोता है ?? हां, तो !

'क्या कहती हो.. ऐसा थोड़ी होता है बेटा, भाई है वो तुम्हारा| भाई से कौन बर्तन धुलवाता है? ये गलत बात है| बेटा, लड़कियां ही घर के काम करते हुए अच्छी लगती हैं|

नहीं, मुझे तो बुरा नहीं लगता आंटी.. बल्कि गर्व महसूस होता है कि वो सभी काम जानता है (राज ये है कि मुझसे भी बेहतर)| और खुशी भी होती है कि मैं घर से दूर हूं उसके बावजूद मां को ये नहीं लगता कि काश. कोई मदद करने वाला होता|

फिर भी बेटा, ये सब काम घर की लक्ष्मी का होता है..

हां आंटी, फिलहाल लक्ष्मी बाहर है और उसका भाई घर सम्भालने में सक्षम है और लक्ष्मी का मान भी बरकरार...'

ये तो चंद लाइंस हैं, जिनसे मुझे दो-चार होना पड़ा वरना तो लम्बा-चौड़ा लेक्चर और लक्ष्मी के गुणों की बातें| आदत हो चली है मुझे| अब तो सवाल भी रट गए हैं कि कौनसा किस नंबर पर आने वाला है| समझ नहीं आता ये लक्ष्मी इतने गुणों का करेगी क्या? वैसे, क्या आपको पता है आंटी को मेरी बातें बुरी लग गई| कहा तो कुछ नहीं, हां अपनी लाडली लक्ष्मी को मुझसे दूर रहने की हिदायत जरूर दे दी होगी| खैर, बचपन से लेकर आजतक मुझे एक बात समझ में नहीं आई कि भाई ने ग्लास उठाकर रसोई में रख भी दिया तो कौन सा पाप हो गया ! ईजा या पापा को पाप क्यों नहीं लगता बल्कि ग्लास न उठाने पर भाई को डाट जरूर पड़ जाती है| बचपन से ही घर में देखती आ रही हूं कि कभी भी मुझे भाई से कम नहीं समझा गया हां, बेटा भी नहीं बनाया गया| दरअसल, पापा का कहना है कि मैं उनकी बेटी ही हूं क्योंकि जरूरी नहीं कि पैदा होने वाला हर शख्स बेटा ही हो| इसलिए मैं 'बेटी' हूं उनकी (जिसे कुछ भी नहीं आता)|

समझ नहीं आता समाज को बेटे के ग्लास उठा लेने, या जूना हाथ में लेकर बर्तन मांझ देने से क्या शिकायत है| और जिस लड़की का भाई ऐसे काम कर ले बस उससे ज्यादा चरित्रहीन लड़की तो हो ही नहीं सकती| मेरे कई दोस्त हैं जिन्हें घर आने के बाद बड़ी अजीब सी सिचुएश्न्स का सामना करना पड़ता है| हां, सही समझे आप... भाई कुछ न कुछ काम करने में व्यस्त जो होता है| उसका घर के कामों में हाथ बंटा देने का मतलब ये नहीं कि वो बाकी चीजों में कम है या मजबूरन काम करता है| बस इतना ही है कि उसे कभी इस बात की शरम महसूस नहीं होती कि लोगों ने काम करते देख लिया या फिर वो भाई जो लोगों में बताता फिरे, 'मेरी बहन ही सारे काम करती है'| बल्कि वो अपनी नादान बहन की दूसरी ईजा है, जो उसे कुछ करने ही नहीं देती|

बिल्कुल ईजा की तरह ही उसके हाथ के बने खाने का स्वाद है, ईजा की तरह ही तो मेरे लिए पूरी बनाते समय अपना हाथ जला लिया था.... मेरी स्पेशल फरमाइश पर ही तो खाने का मेन्यू फाइनल होता था| ईजा के घर में न होने पर भी न खाने के लिए बहाना ढूंढना पड़ता है (दूसरी ईजा जो रहती है) मुझे कभी बुरा नहीं लगा, शायद भाई को भी नहीं| खुद अपने ही परिवार में भाई-बहन के बीच भेदभाव देखा है, लेकिन शायद उसे महसूस नहीं कर सकती क्योंकि वो तकलीफ कभी महसूस ही नहीं हुई| शायद इसीलिए कभी भी लड़ पडती हूं इस बात पर और मेरे अपने भी अपनी बेटियों को मुझसे दूर रखना ही पसंद करते हैं (संस्कारी बेटी मेरी तरह बदतमीज हो गई तो)

अगर आपको लग रहा है कि हमारे घर में सिर्फ भाई का घर के काम करना ही बराबरी है तो जरा रुकिए, हमारे पिता जी बिटिया को भी गलती करने पर वही सजा देते हैं जो बेटे को| असमानता का सवाल ही पैदा नहीं होता| अब ऐसा भी नहीं है कि मेरा घर कोई अनोखा घर है, मैंने बहुत से ऐसे घरों को देखा है जहां बेटा-बेटी दोनों के लिए एक जैसे कायदे-कानून हैं| इसी समाज में बहुत सी अच्छाई हैं, जैसे मेरे ही परिवार में बहुत सी बुराइयां| किसी लड़के का घर के कामों में मदद करना उसकी कमजोरी नहीं ताकत है| जो कहीं न कहीं उसे अपनी मां से, अपनी बहन से या आने वाले वक्त में उसकी पत्नी से सीधे तौर पर जोड़ता है| ये महज किताबी बातें नहीं मेरे जीवन का अनुभव है| घर से दूर, अपने ईजा-पापा को भाई के साथ के साथ खुश देखना| बिना ये सोचे कि वो ईजा का काम बढा रहा होगा| इस यकीन के साथ की जब ईजा बीमार होगी तो वो ठीक वैसे ही वक्त पर दवा देगा, जैसे मैं दिया करती थी और पापा ऑफिस से आने के बाद एक अदद अदरख वाली चाय पी सकेंगे बिना मुझे याद किये हुए|

वो सिर्फ घर कि जिम्मेदारी नहीं सम्भालता, मेरी परेशानियां भी अपनाता है बिना ये जताए कि वो एक लड़का है| मैं इसलिए नहीं लड़ती उससे क्योंकि वो मेरा काम बढ़ाता है, बल्कि इसलिए लड़ती हूं क्योंकि वो मेरी चाय में चीनी ज्यादा डाल देता है| जितना भी समझा है उससे यही सीखा है कि संस्कार की कोई लिखित परिभाषा नहीं... सच की ही तरह संस्कार की परिभाषा भी इंसान बदलने के साथ बदल जाती है| बस एक लकीर है जिसे मिटा देने पर बहुत कुछ मिट जाता है| अब फैसला तो हमारा है कि अच्छी लकीर मिटा दें, या बुरी मिटाकर संस्कारों की नीव पक्की कर लें| हां, मजाक उड़े न उड़े... गर्व जरूर महसूस होता है जब लोग कहते हैं, 'काश ये मेरा बेटा होता|' अब इसके लिए तो आपको भी वैसे 'मा-पा' बनना पडेगा| तो आज से शुरुआत की जाए !!!!


(भावना तिवारी- it's all about feelings)

2 Responses so far.

  1. कॉलमनिस्ट या लेखिका को पढ़ने जैसी फीलिंग रही।
    अच्छी सोच और सामाजिक बदलाव को रिव्यु करवाता सा। गुड भावना_एं

  2. Anonymous says:

    very sweet bhawna g ............it is real & sweet complain .i hope that every body like your all best post
    ...i like

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