हर कमरे में एक बिरादर

चलते-फिरते जब लोगों से डर लगने लगता है या यूं कहूं अपने ही अस्तित्व पर सवाल उठाने लगती हूं, तब मन करता है कि कोई मिले| कोई शख्स अपने ही जैसा बेचैन सा, जिसे आसानी से अपने मन की बात कह सकूं, जिसके मन की बेचैनी सुन सकूं| कई बार ऐसा होता भी लेकिन हर बार हो, ऐसा मुमकिन नहीं| जब महीनों बाद भी कोई जगह अपनी सी न लगे तो समझ लीजिए, कोई न कोई तो लोचा जरूर है| कुछ अपने बनते भी हैं तो वक्त बीतने के साथ ही वो भी गलत साबित कर ही देते हैं|
इस नए शहर में लगभग एक साल होने वाला है लेकिन अब भी अपनेपन और विश्वास की कमी सी लगती है| शायद अकेलापन इंसान को बहुत कमजोर कर देता है, इतना अकेला कि आसपास के लोगों की मौजूदगी भी किसी साथ का एहसास नहीं देती| ये सिर्फ मेरी ही कहानी नहीं, बल्कि अपने घर से दूर आए उन सभी लोगों की है जो शायद अपने परिवार से कुछ ज्यादा ही जुड़े हुए हैं| या शायद जिनके लिए रिश्ते स्टेटस सिम्बल नहीं दिल से जुड़ा अहसास है| अपना भी ऐसा ही कुछ किस्सा है| एक कमरा है जहां अपने ही जैसे लोग हैं, खुश तो सभी हैं लेकिन सभी के पास सुकून की थोड़ी सी कमी है| अपनी जुबान में कहूं तो हर कमरे में एक बिरादर है|
बस कुछ वक्त और फिर इस शहर में एक साल पूरे| इतने वक्त में बहुत कुछ बदला है| जिन रिश्तों को सालों से सम्भाल कर रखा, थोड़ा सा कमज़ोर पड़ते ही टूट से गए कहीं| शब्दों का सफर भी थम सा गया था, फिर से वापसी की उम्मीद तो कर ही सकती हूं| खैर बात है उन बिरादरों की जो मेरी ही 'हम तो झोला उठाकर चले' स्टाइल में घर से निकल तो पड़े हैं लेकिन ख़्वाबों के पीछे दौड़ते-दौड़ते खुद से कहीं दूर निकल आए हैं| आपस में अपने दिल की बातें तो बांट लेते हैं लेकिन उस राज को नहीं जो हर रात परेशान करता है| खैर कुछ लोग मिले हैं जो अपने से हैं, कुछ लगे थे और कुछ अपने से लगने हैं| कई बार हर चेहरा दो चेहरे लिए हुए लगता है लेकिन उन चेहरों से भी मोहब्बत सी होने लगी है|
इस एक साल ने जिंदगी के कई नए फलसफे समझाए हैं, बेहद खूबसूरत फलसफे... कभी रुलाकर, हंसाकर... अब तो बस चलते रहना है इन सभी बिरादरों के साथ मुस्कुराते हुए| किसी का अपना बन जाते हुए और किसी को अपना बनाते हुए|

2 Responses so far.

  1. अकेलापन भी अकेला कहाँ होता हैं
    आपको सपरिवार होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ .....!!
    http://savanxxx.blogspot.in

Leave a Reply