बचपन में ही बड़े हो जाते हैं हम...

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बच्चों का शारीरिक शोषण। जब भी इस तरह की बातें सुनाई देती हैं तो दिल धक से हो जाता है। लगता है मानो कुछ जानी पहचानी सी बात हो। और जब आप ख़बरों की दुनिया में हों तो ये सब बातें और भी जरूरी हो जाती हैं। जब आप ख़बरों की दुनिया में काम करते हैं तो बच्चों के साथ शोषण, समाज में हो रही नकारात्मक घटनाओं से लोगों को आगाह करने की जिम्मेद्दारी होती है।  अब जिम्मेदारी मिल रही तनख्वाह की वजह से आये या फिर अंतरात्मा की आवाज़ से, ख़बरें तो देते ही हैं।आज ही खबर दी कि सऊदी अरब के रियाद शहर के अल कस्र मॉल के कर्मचारी ने एक बच्चे को जबरदस्ती चूम लिया। उसकी किस्मत खराब थी कि उसकी ये हरकत एक वीडियो की शक्ल में एक मोबाइल फोन में कैद हो गयी और शायद उसे इस घिनौनी हरकत की सजा भी मिल गयी होगी।  लेकिन ऐसी घटनाएं कभी पुरानी नहीं होतीं।

सिर्फ सऊदी ही नहीं पाकिस्तान में भी एक इलेक्ट्रॉनिक शॉप में एक बच्ची के साथ वहां के कर्मचारी ने अश्लील हरकत की। ब्रिटेन के वेस्टफील्ड डर्बी शॉपिंग सेंटर में भी कर्मचारी ने एक बच्चे के साथ बदतमीजी करने की कोशिश की।  हालांकि, मां की सतर्कता ने अनहोनी होने से बचा लिया। एक तीसरा वीडियो जो नजर में आया वो स्कूली बच्चों का था, जहां टीचर की सतर्कता ने बच्चे को बचा लिया।

जिन आंकड़ों पर पड़ी नजर-

इस खबर पर काम करते-करते जब महिला और बाल विकास मंत्रालय के एक सर्वे पर नजर पड़ी तो पाया कि हमारे देश में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है।  इस सर्वे के मुताबिक 5-7 साल की उम्र के बच्चों के साथ गलत हरकतों का जोखिम सबसे ज्यादा होता है। हर 10 बच्चों में से 7 बच्चों का यौन शोषण होता है। चौंकाने वाला आंकड़ा था कि इनमें से 4 लड़के होते हैं और तीन लड़कियां। यौन शोषण का शिकार होने वाले 5 बच्चों में से एक के साथ गंभीर किस्म का अपराध होता है जबकि 3 बच्चों के साथ शारीरिक छेड़छाड़ की जाती है। महिला और बाल विकास मंत्रालय की ये आखिरी रिपोर्ट 8 साल पहले आई थी और इसमें सिर्फ 13 राज्यों के 12,447 बच्चों को शामिल किया गया था।

इतना आसान नहीं बताना- 

ख़बरों में इन सब बातों को बताना और प्रवचन देना बेहद आसान काम होता है। ये बोलना भी कि जब भी कोई अश्लील हरकत करे तो उसे मां-बाप से या किसी करीबी और विश्वास पात्र को बताना चाहिए लेकिन इतना आसान नहीं होता। दूसरों को समझाना आसान  है लेकिन जब खुद आप इस तरह की बातों से दो-चार हो चुके हों तो समझाना और समझना दोनों ही मुश्किल हो जाता है। 

बचपन में ही बड़े हो जाते हैं हम-

शायद इतने सालों से बहुत कुछ है जो छुपा है, वो बाहर आने की राह देखता है। एक कहानी सुनी ट्यूटर से शारीरिक शोषण की।  कुछ ऐसा ही बचपन में हुआ था जब पापा ने अच्छे मार्क्स के लिए एक ट्यूटर लगवा दिया। मेरे और भाई के पढ़ने का समय अलग अलग तय किया था उसने। कुछ वक्त बाद उसका प्यार से गालों पर हाथ फिराना, पुचकारना अजीब लगने लगा था। धीरे-धीरे समझ आया कि आखिर हो क्या रहा है। कभी हिम्मत नहीं हुई कि ईजा को बता पाऊं कि किस मानसिक स्थिति से जूझ रही हूं। बस जिद करके ट्यूशन बंद करवा लिया, कभी हिम्मत नहीं हुई दोबारा ट्यूशन पढ़ने की।

कहते हैं ऐसे किस्से आसानी से खत्म नहीं होते। कुछ साल बाद पड़ोस की दीदी की शादी में उनके मामा ने भी कुछ ऐसा ही करने की कोशिश की। खास बात थी कि वहां बैठे किसी भी शख्स को मेरी कसमसाहट समझ नहीं आई। बल्कि, हाथ फेरकर सभी अपने-अपने काम में बिजि हो जा रहे थे। लगा मानो सब मामा जी की हौसलाअफजाई कर रहे हों। 

ऐसे ना जाने कितने वाकये हैं जो हल्की धुंध की तरह दिल-ओ-दिमाग पर छाया हुआ है। किसी को भी बताने की हिम्मत नहीं हुई। हां, इतना जरूर हुआ कि अपने आप स्पर्श की परिभाषा समझ आ गई और अपने छोटे भाई-बहनों के लिए खड़े रहने का तरीका भी।

खबरें लिख देना आसान है-

सभी बातों की खबर बना देना शायद बहुत आसान है लेकिन खुलकर बताना बहुत मुश्किल, भले ही मां-बाप कितने ही खुले विचार के हों।

इन दिनों बच्चों को 'कोमल' नाम की फिल्म दिखाई जा रही है जिसमें अच्छे और बुरे स्पर्श का अंतर बताया जाता है। वहीं ऐसे हालात में खुद को ना कोसकर हिम्मत से सामना करना सिखाया जाता है। पता नहीं, लेकिन चाहकर भी ये हिम्मत मुझमें ना आ सकी। हां, बचपन में ही बड़ी जरूर हो गई। शायद उस वक्त 'कोमल' आ गई होती तो आज खबर बांचने के बाद या इतने साल बाद इस तरह लिख ना रही होती। शायद, ये अनचाहा बोझ ना ढो रही होती।

उम्मीद करती हूं 'कोमल' किसी एक की मदद तो करेगी ही।


(भावना तिवारी- it’s all about feelings)

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6 Responses so far.

  1. arslan says:

    With a very heavy hear I'm saying this that it is very unfortunate that pedophiles, child abusers exist on our planet. There can be nothing more cruel than tearing the childhood apart. Not only it takes away the excitement of attaining puberty but also leaves impressions of fear and embarrassment to the rest of the life. Inhibitions to new relations, social trauma, capsized nature become illustrations of their behavior. I feel offended to even think about the gruesome reality to the fact that people do absurd things to kids. Appreciations to you to bring it out in such manner, and I think you wrapped it pretty well Bhawna.

  2. Deepak says:

    Nice blog with shocking facts...All the very best.

  3. abhisar says:

    Profound. Heart wrecking. Disturbing. But inspirational too.

  4. You have actually made it worth reading

  5. खबरों की दुनिया में हावी होते बाजारवाद के लिए ये मुद्दा उतना बड़ा नहीं जितना अवैध संबंधों से पैदा हुई एक मर्डर मिस्ट्री. दुनिया हर खबर में मसाला ढूंढती है. तुमने चोट सही जगह की है, पर हमारी चोटों का असर बड़ी देर में होगा.

  6. Bahut shandaar... Haqeeqat se rubaru karati hui

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