दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन ...............

हर बार मेरे विचारों, मेरी कहानी की उपज ऑटो में बैठे-बैठे होती है तो इस लेख की उपज का कारण भी ऑटो ही है.....आज जब यूनिवर्सिटी से लौट रही थी तो ऑटो में रोज़ की तरह अनजाने लोग बैठे थे, सभी के माथे पर शिकन की लकीर दिखाई दे रही थी, कोई अपने भविष्य को लेकर परेशान तो कोई अपने रिश्तो में उलझा हुआ सा दिख रहा था....बस एक ऐसा था जो ऑटो में बैठे सभी लोगों से हटकर था...अपनी माँ की गोद में बैठकर खिलखिला रहा था, दुनिया की किसी भी बात से उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था....न रिश्तो की उलझन न कोई परेशानी......चाहे किसी और बात का एहसास हो न हो बस उसे एक बात का एहसास था और यकीन भी के अपनी माँ की गोद में वो महफूज़ है.....


इसी सोच में डूबी ही थी के तबतक ऑटो वाले ने एक गीत चला दिया "दिल ढूँढता है फिर वही, फुर्सत के रात-दिन" बहुत खूबसूरत गीत लगता है ये...शायद लता जी और भूपिंदर हजारिका का गाया हुआ "मौसम" फिल्म का गीत है ये जो 1975 में आयी थी , गुलज़ार साहब ने दिल के एहसासों को बड़ी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोया था इस गीत में....इसको सुनते ही बचपन के दिन याद आ गये जब हम भी ईजा की गोद में यूँही सुकून से बैठा करते थे... न कोई चिंता, न कोई काम...बस ईजा जो कहती वो सही, ईजा जो करती वही बस दुनिया का सबसे जरूरी काम होता...जब गर्मियों के दिनों में लाइट चली जाया करती तो हाथ दर्द का बहाना करके सोने का नाटक करते और तब ईजा अपने हाथ से करेले की मज़ेदार सब्जी और रोटी मुझे और दा(भाई) को खिलाया करती, उस वक़्त छप्पन भोग भी उसके सामने कुछ नहीं लगता था....वक़्त बीता और वो सुकून भरे दिन भी बीत गये...ईजा तो वही रही पर शायद हम बदल गये....

दा, ईजा और मैं  
आज ना ईजा के हाथ से खाना खाने का वक़्त मिलता है ना ही बहाने करने का मनं करता है, ऐसा लगता है हम बड़े हो गये.......शायद ये एहसास सभी के साथ रहता है पर अगर ध्यान से देखे और दिल से महसूस करें तो लगता है के आने वाले कल की परेशानियों ने आज हमें उलझा कर रख दिया है के हम उस कल के लिए आज के सुकून को दाँव पर लगा कर बैठे हैं...पहले कितनी फुर्सत थी ये पूछने की के दिनभर क्या हुआ? और आज वक्त नहीं हाल जानने का...एक ही घर में रहते हुए भी इतनी फुर्सत नहीं के साथ बैठकर थोडा खिलखिलालें, और एक वक़्त ऐसा था जब लगता था कुछ भी हो जाये हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे पर वक़्त की आंधी और अपनी आकांक्षाओं के चलते आज यूँही खुद से बेगाने हो गये हैं.....
खुद की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए कई बातों की अनदेखी करना छोटी सी बात हो गयी और जब यही अकेलापन सालता है तो हम अपनी पुरानी यादों का पिटारा खोलकर बैठ जाते हैं...और खुद को समझाते हैं के हम खुश हैं, शायद ऐसा होता भी है पर सिर्फ सामने से देखने वाले शख्श के नज़रिए से....सचाई इससे कोसों दूर होती है....नाम और काम के चक्कर में हम अपनों से दूर हो जाते हैं और इस बात का एहसास हमें तब होता है जब हमारे वो अपने हमसे दूर चले जाते हैं और हमें लगता है कोई तो होता जिससे हम अपने दिल की बात करः पाते....
वक़्त के साथ-साथ हमारी जिम्मेदारियां बढती हैं और हमारी जरूरतें बदल जाती हैं पर कुछ जज़्बात जो वक़्त की आंधी में दिल के किसी कोने में दफ़न हो जाते हैं वो एक दिन यूँही अकेले बैठकर चाय पीते-पीते आँखों के सामने आ जाते हैं, और वो दोस्त, वो पल होठों पर मुस्कुराहट और आँखों में आंसूं दे जाते हैं.....चाहे कोई कितना ही कह ले उसे फर्क नहीं पड़ता पर सचाई यही है के फर्क पड़ता है और उस दिल की गहराईयों से जज़्बात की जो लहरें उठती हैं उन्हें रोक पाना नामुमकिन होताहै...
आज जब भी लाइट जाती है तो दिल करता है फिर से ईजा उसी तरह अपने हाथों से खाना खिलाये और खिलाते-खिलाते झूठा गुस्सा करते हुए कहे "अब नाटक बंद कर और चुप-चाप अपने हाथ से खा"....और मैं उसी मासूमियत के साथ खिलखिला उठूँ और ईजा के गालों को चूमकर कहूँ "ईजा तू कित्ती प्यारी है, हंस दे ना"... ज़िन्दगी सिर्फ नाम कमाने के लिए नहीं होती, दिल के जज्बातों को थोडा सा वक़्त दीजिये और अपने रिश्तों पर यकीन कीजिये बिलकुल उस बच्चे की तरह जो गिरते वक़्त भी मुस्कुराता रहता है क्युनके उसे यकीन है के उसकी माँ उसे थाम लेगी......इस लेख को लिखते समय मुझे तो बहुत कुछ याद आ रहा है, शायद आपको भी किसी की याद आ रही है और दिल यही गीत गुनगुना रहा है..हैं ना!!!!!!!

10 Responses so far.

  1. Ultimate feelings of real life ...aur jo word use kiya hai ija bahut acha laga padke ..really appreciable

  2. @anshu: thanx dear....

  3. Anonymous says:

    Such me bhawna pd ka maza aa gaya au gha ki yaad aa gayi....

    (N!k)

  4. neha says:

    bhawna,,,bht khub likha h.... feelings nazr aari h.

  5. again BT with Nice Thohghts ! ! This song is really nice one, already a part of my playlist ..and regularly listen while in way 2 ofc ..शायद ये सोचके की फुर्सत के वो रात-दिन .. किसी दस्तक के साथ वापस आ जाये .. आपने सही कहाँ कहीं रिश्तों की उलझी बात, तो कहीं आगे बढने की बेतहाशा दौर शायद अपने फुसरत के रात दिन का हमने खुद ही गला घोट के रखा है .. {सबकी सोच btkibaaten में नजर आती }

  6. pramod says:

    mujhe kuch khas nai laga, kyo ki isse pahle bt ki baaten bahut gahrai wali rahi hai to mai to ise bus theek hi kahunga na ki bahut achcha.jab koi pehli bar likhta hai tab ke liye to sahi par jisne achche lekh likhe ho usse hum kuch jyada hi achcha pana chahte hain, agar feel ho to uske liye sorry,maine bus apni feelings likh di.par umeed hai agla post jaroor achcha likhogi

  7. @nik: thanx 4 ur precious comment...

  8. @sujit:shukriya sujit ji, bs kuch ehsaas the jinhe shbdon mein ukera hai...

  9. @pramod: aage se aur achcha likhne ki koshish krungi..umeed h aapko psnd ayega

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