ठहरिए.... यही मधुशाला है

आज रामू बहुत दुखी है, हो भी क्यों न! मंहगाई जो बढ़ गयी है| आलू, टमाटर,प्याज यहाँ तक कि हरी मिर्च जैसी छोटी सी चीज़ भी उसकी आँखों में आंसूं लाने से पीछे नहीं हट रही| ऐसा लग रहा है मानो ये सभी चीज़ें उसके उतरे चेहरे और भूखे पेट का मजाक उड़ा रही हो| इन ख्यालों में खोया हुआ रामू अचानक रास्ते में ठिठक गया, न जाने क्यों उसके बढते कदम खुद-ब-खुद रुक गए| कुछ तो था जो उसे अपनी तरफ खींच रहा था, न तो ये कोई शख्स था, न ही खजाना बस एक छोटा सा बोर्ड था जिसपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- “ठहरिए... यही मधुशाला है”|

कुछ देर पहले तक जिस चेहरे पर चिंता और भूख की आँख-मिचोली चल रही थी अब उसी चेहरे पर संतोष और संतुष्टि का भाव दिखाई पड़ने लगा| होठों पर एक छोटे बच्चे सी मुस्कान खिल गयी, मानों किसी भटके हुए को उसकी मंजिल मिल गयी| इस एक बोर्ड ने रामू की दुनिया-जहान की चिंता को चुटकी में मिटा दिया और वो चल दिया अपनी परम प्रिय मित्र ‘मधु’ का सहारा लेने| मधु की एक बूंद ने ही उसे ऐसे परमानंद की अनुभूति करा दी जिसकी तलाश न जाने उसे कबसे थी| जिस इंसान के पास एक आलू खरीदने के पैसे न थे वो अबतक न जाने कितने ही रूपये इस मधुशाला के हवाले कर चुका था|

ये वाक्या कोई नया नहीं, ऐसे वाकये रोज होते हैं| इसके लिए ज्यादा दूर मत जाइये बस अपनी गली के किनारे खुली ठंडी बीयर की दुकान पर नज़र दौड़ाइए.. नज़ारा ख़ुद--ख़ुद साफ़ हो जाएगा| न जाने कितने ही लोग अपना गम भुलाने के लिए इस मधुशाला में मिलने वाली मधु का सहारा लेते हैं| ऐसा लगता है मानो इन दुखियारों के हाथ कोई रामबाण लग गया हो| सिर्फ यही नहीं, इन ठेकों को चलाने वाले ठेकेदार अगर इस बात का दावा करें कि दुनिया का सबसे आकर्षक वाक्य इस मधुशाला ने ढूंढ निकाला है तो कुछ गलत नहीं होगा| आखिर सबसे ज्यादा कदम यहीं तो रुकते हैं| इस बात से तो सरकार भी इत्तेफाक रखती है, आखिर कौन सा आम आदमी है जो “मस्त-मस्त ठंडी बियर” को अपने होठों से नहीं लगाना चाहेगा!

पूरे देश की बात छोड़ भी दें तो खुद हमारे ‘तहजीब के शहर’ लखनऊ का हाल जुदा नहीं है| चारबाग रेलवे स्टेशन हो या कोई छोटी मोटी गली, ऐसे ठेके हर जगह बेधडक खुले हुए दिख जाएंगे, जहां बड़े ही आकर्षक तरीके से लिखे हुए बोर्ड सामने से गुजर रहे शख्स को अपनी ओर खींचते हैं| बहुत कम ही ऐसे होते हैं जो इस मोहपाश से खुद को बचा पाते हैं| आखिर इस मधु और मधुशाला ने पौराणिक काल से ही अपनी अलग पहचान बनाई है, इसके मोह से तो देव भी न बच सके फिर इंसान क्या चीज़ है| हर जगह किसी न किसी रूप में ये मधुशाला लोगों को सहारा देती नज़र आती है और लोग भी इसके साथ में अपने सभी दुःख को भूल जाते हैं|

अब मानें या न मानें सरकार को भी सबसे ज्यादा टैक्स आखिरकार मधुशाला से ही मिलता हैं| बेशक, सरकार ने गैर सरकारी ठेकों को बंद करने के लिए बहुत से सख्त कदम उठाये हैं लेकिन कुछ ठेकों को शय भी मिली हुई है, हो सकता है इनकी संख्या कम हो लेकिन सच्चाई यही है| हालाँकि, इसके लिए सिर्फ सरकार को दोष देना ठीक नहीं| जहां, हम मंहगाई बढते ही रसोई में कटौती करने लगते हैं उसके उलट शराब के दाम बढ़ने का कोई असर क्यों नहीं होता? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब तो सबके पास है लेकिन कोई कुछ बोलना नहीं चाहता| जिम्मेदारी या जवाबदेही किसी एक की नहीं बल्कि सबकी है| दूसरों पर सवाल उठाना तो बहुत आसान है लेकिन खुद पर उठे सवालों का जवाब देने से हम इतना क्यों कतराते हैं!

बेशक ये मधुशाला बेहद आकर्षक रूप में सामने आती लेकिन इस आकर्षक रूप से इतना भी क्या मोह कि जान से हाथ धोना पड़े| अब इस बात का फैसला तो हमारे ही हाथ में कि हम क्या चाहते हैं, सरकार तो बस उतना ही कर सकती है जितना उसके हाथ में है बाकी डोर तो आखिर हम ही पकड़ाते हैं| समझदारी तो इसी में है कि देखिये, सुनिए, पढ़िए और बस इस मधुशाला को एक मुस्कान देकर आगे बढ़ जाइये|

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6 Responses so far.

  1. Unknown says:

    Haqiqt se rubru karane ka shukriya........ well written

  2. किस ने रास्ता बताया तो हमे अहसास हुआ .. अब तक बस गलत उबर खाबर रास्तों पर थी जिंदगी ! एक सच्चाई भरी प्रेरणा स्रो़त आपकी लेखनी ! आपके शब्दों में वो विचार है, सोच ..समग्र चिंतन जो आपको और आपके लेखनी को अलग बनाती !

  3. bahut umda likha hai.....aise hi likho..dil ke karib laga...

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