जिंदगी के स्ट्रीटलाइट


जिंदगी के कुछ पल स्ट्रीटलाइट की तरह होते हैं, वो राह को छोटा नहीं बनाते लेकिन राह को रौशनी से भर देते हैं और सफर को यादगार बना देते हैं| इस सफर में मिला एक सही दोस्त, प्यारी यादें, दिल में घुली हुई मस्ती, जिंदगी को सही मायने में बदल देते हैं| बीते हुए कल का यह सफर रह-रह कर याद आता है, अगर भुलाना चाहें तब भी दूर नहीं जाता, बस कुछ पलों के लिए दिल के किसी कोने में छुपकर बैठ जाता है और मौक़ा मिलते ही दोबारा सामने आ जाता है| इन यादों के साथ लौटते हैं दोस्त, वो पहला प्यार, पहली नोकझोक और अनजान लोगों का साथ जो कुछ समय बाद ही दोस्ती में बदल जाता है| कहते हैं न-
“दोस्त लौटते हैं जैसे लौटती हैं सर्दियां,
जैसे पेड़ों पर गिलहरियाँ और तितलियाँ ख्वाब में|” 
भले ही जिंदगी में हम बहुत आगे निकल जाए, दिल तो वहीँ-कहीं छूट जाता है- अपनी कॉलेज लाइफ में| इस कॉलेज लाईफ की तस्वीरें भले ही धुंधली हो जाएं, हवा का एक झोंका आता है और यादें फिर से महकने लगती हैं| इन यादों को भुलाने का कोई जरिया भी तो नहीं| आखिर यही तो है जिंदगी के गोल्डन डेज़| जिंदगी के बीते हुए कल की ये यादें भुलाए नहीं भूलती, आखिर इन यादों में कुछ ख़ास जो है| कितना अजीब लगता है उन पलों को याद करके हंसना जब हमने आंसू बहाए थे और आँखें भर आना जब याद आते हैं मुस्कुराहटों के खूबसूरत पल| कभी सीढियों पर बैठकर मुंह बनाना और उसी स्टाइल में तस्वीरें खिंचाना| उस वक्त तो एहसास भी नहीं होता के हम अपने पास तस्वीरें नहीं यादें सहेज रहे हैं| शायद इन पलों को याद दिलाने की जरूरत नहीं होती|
“वो पुराने सुरीले रिश्ते, जगमग-जगमग सुरीली रातों में बज उठते हैं|
कैसे भूल जाएं उन यारों को, जिनकी महफिलें दिल में सज उठती हैं||” 
ये पल होते ही इतने खूबसूरत हैं के भुलाए नहीं भूलते, वो लडकपन के दिन, पहला प्यार, पहला इकरार और शायद न भूलने वाला इनकार| कितना हसीन एहसास है ये, हमारी जिंदगी में एक ऐसी छाप छोड़ जाता है जिसे याद करते ही हम फिर उसी दुनिया में पंहुच जाते हैं| एक ऐसी दुनिया जहाँ न तो कोई परेशानी थी न ही कोई चिंता, बस दोस्तों का साथ और हवा में घुली बेफिक्री| हर काम दिल से होता था, दिमाग तो जैसे बचा कर रखना था आगे के लिए| इन यादों की डोर के बारे में क्या खूब कहा है किसी ने-
“बूँद-बूँद भरता है घड़ा, नदी-नदी बनता है सागर |
लम्हा-लम्हा बनती हैं यादें, डोर-डोर बनता है जीवन ||” 
इन शब्दों को अलग कर दिया जाए तो इनका कोई अर्थ नहीं निकलता लेकिन साथ होने पर यही शब्द कैद कर लेते हैं वो यादें, वो प्यार, वो एहसास जिन्होनें कभी हमें जिंदगी के फलसफे को समझाया था| साथ पढ़ा जाए तो इसका एक अर्थ निकलता है, ऐसा अर्थ जिसमें जिंदगी के खूबसूरत पल कैद हैं| कभी सोचा है उस वक्त का दुश्मन आगे चलकर किस तरह एक ख़ास दोस्त में तब्दील हो जाता है| ये दुश्मनी बस उस लडकपन का एक हिस्सा थी और कुछ भी नहीं| आज बस उसकी कुछ यादें हैं| दूध के उबाल की तरह पल भर के लिए दिल में बसी इस दुश्मनी को अगर समझना हो तो कहा जा सकता है- “मंजिल का पता नहीं रास्तों का है, वादों का पता नहीं वास्तों का है|”
चाहे कितना भी छुपाने की कोशिश करो, याद आ ही जाता है वो कॉलेज लाइफ का पहला प्यार| जब प्यार का इज़हार करने के लिए भगवान से हिम्मत मांगी थी| वो पल जब पहली बार डरते-डरते हाथों में लाल गुलाब थामे उससे अपने प्यार का इज़हार किया था और उसने मासूमियत से अपनी बोलती आँखों से प्यार का इकरार किया था| दिन रात किताबों में इज़हार-ए-मोहब्बत लिखना, कितना अच्छा लगता था उसके ख्यालों में खोये रहना| आज भी याद है वो एहसास जिसने किसी के प्यार में डूबकर शब्दों का रूप ले लिया था-
“तू कुछ इस तरह करीब आने लगा है, दिल-ओ-दिमाग में तू ही छाने लगा है;
कुछ चंद लम्हे जो गुज़ारे थे साथ, कुछ-कुछ पल वो तन्हाइयों में सताने लगा है|
तुझसे वो एक अनकही गुज़ारिश, साथ रहने की वो दिल की ख्वाहिश;
साँसों में कहीं तू ही समाने लगा है, अंधेरों में भी तेरा वजूद नज़र आने लगा लगा है||” 
इसके जवाब में उसने भी तो कुछ कहा था शायद, जो कभी सामने न कहा उसे लफ्जों में बयां किया था| उसके जवाब ने ही तो पूरे किये थे दिल के एहसास- “खासियत है ये तुझमें, के तू बहुत सीधा-साधा है; बेफिक्र हूँ मैं क्यूंकि, तू प्यार कम और दोस्त ज़्यादा है|” बस उसका इतना कहना ही काफी था प्यार के लिए|
बदलते वक्त के साथ न जाने कब सारे दोस्त बिछड़ गये, बस यादों का कारवां रह गया दिल में| दिल करता है काश वो दिन फिर से लौट आयें, वहीँ दोस्त, वही किताबें और वही बेफिक्री| ये पल तो जैसे कितनी जल्दी बीत गया| स्कूल की वो टॉम ब्वॉय लडकी हो या वो शर्मिला सा लडका जो बस अपनी ही सीट पर पाया जाता था, दिल करता है फिर से उनसे मिलूं, उस पल को जियूं एक बार फिर| टीचर्स के वो अनोखे नाम भी तो जान हुआ करते थे| एक बार मौक़ा मिल जाए तो शायद कुछ अधूरी प्रेम कहानियाँ पूरी हो जाएँ, शायद कुछ इनकार इज़हार में बदल जाएँ और उस टॉम ब्वॉय लडकी के दिल में भी कुछ-कुछ हो जाए| आज तो वो शर्मिला लडका भी नजर नहीं आता, वक्त बीता तो न जाने सब कहा चले गये| 
प्रेम-कहानियाँ वैसे तो हर उम्र, हर जगह होती हैं लेकिन कॉलेज लाइफ की प्रेम-कहानी कभी भुलाई नहीं जा सकती| उस पल को दोबारा जीने की ख्वाहिश हर पल दिल में हिलोरें मारती हैं| बस इन पलों की यादें हैं, जिनमें जीना एक हसीन ख्वाब से कम नहीं| अब तो बस याद आता है- 
“अल्हड सा वो एक लडका, जो छुपकर देखा करता था
शर्मीली सी वो एक लडकी, ख़्वाबों में खोई रहती थी;
कुछ सपने संजोए आँखों में, हम घर से निकला करते थे
कंधे पर टाँगे बसते से हम, यूँही खेला करते थे|
बाहों में डाले बाहें, दिल की बातें करते थे
कुछ नाराज़ से रहते थे, कुछ खोए-खोए रहते थे
झूठे-मूठे गुस्से से, हर बात मनाया करते थे
दो नैनों के यूँही हम, पेंच लड़ाया करते थे||
यारों की महफिलों में, न जाने क्या-क्या कहते थे
अब तो बस ये यादें हैं, जिनमें बस फरियादें हैं
नहीं दिखता अल्हड वो लडका, न ही वो शर्मीली सी
यादों की परछाई है, दिल में भीनी-भीनी सी||”

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7 Responses so far.

  1. Ati sundar Chippo..... just get refresh with some old memories of my college life ..thank you very much dear ... :)

  2. जिंदगी तो बसर हो ही जाती, कुछ सपने, कुछ फैसले, कुछ फासले, कुछ मुकाम इसे यादगार कर जाते ! और यही जीने के मायने है ! ऐसे तो बस उम्र तो सब बिताते !

    भावों से भरी रचना आपकी !

  3. जिंदगी के बीते हुए कल की ये यादें भुलाए नहीं भूलती, आखिर इन यादों में कुछ ख़ास जो है|

  4. जिंदगी के स्ट्रीटलाइट .....

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