दिल वालों की दिल्ली...

Pic Courtesy: Mohd Javed

देश की राजधानी और दिल वालों की दिल्ली. इसकी बात ही निराली है और बात अगर यहां की चकाचौंध की हो तो शब्द कम पड़ जाते हैं. बस देखते रहिये और धीरे-धीरे ये चकाचौंध आपको अपनी आगोश में ले लेगी. कौन होगा जिसे ये शहर और यहां की चकाचौंध पसंद नहीं होगी. हर शख्स ही तो इस शहर का हिस्सा बनने का ख्वाब देखता है, बहुत से ऐसे भी हैं जो इस ख्वाब को जीते हैं. एक ऐसा शहर जो हमेशा चलता रहता है, मानो कभी रुकना सीखा ही ना हो. दिल्ली एक ऐसे शोर की तरह है जिसकी आवाज में बहुत सी आवाजें दब जाती हैं.. कभी-कभी कुछ काम का भी लेकिन इस शहर का अपना ही मजा है एक अपना ही अंदाज.. कई बार लगता है मानो दिल और दिमाग ने काम करना करना बंद कर दिया हो लेकिन दिलवालों के शहर में ऐसी बातें सोचना भी गुनाह ही है. आखिर ये चकाचौंध ही तो है जो इसे दूसरों से अलग करती है.
   अब ये आपके ऊपर है कि इस चकाचौंध का सही इस्तेमाल कीजिये या नजर के चौंधियाने तक खुद को खो दीजिए. अभी कल-परसों ही तो एक दोस्त से बात हो रही थी. बहुत वक्त गुजार चुका है इस शहर में और अब तो ये शहर उसकी रगों में खून बनकर दौड़ता है. कह रहा था- 'मुझे यहां की चकाचौंध और इसके कभी न थमने का अंदाज बहुत पसंद है... अब तो लगता है इसे छोड़कर कहीं न जा पाऊंगा. बस घर की याद आती है कभी-कभी लेकिन यहां भी तो छोटा सा परिवार बन गया है, जिसे छोड़कर जाना अब मुश्किल सा लगता है..
   मुझे भी तो लगभग एक साल से ज्यादा हो चुका है इस न थमने वाले शहर में. जितना समझ आया उससे यही जाना कि दिल्ली एक तेज रफ़्तार से चलती वो गाड़ी है जो सबकुछ पीछे छोड़ देती है. वो ख्वाब, जो रातों की नींद उड़ा देता है. एक ऐसी जगह जहां शब्द गढे जाते हैं.. शब्द बुने जाते हैं और उन शब्दों से नई कहानियों का जन्म होता है. शब्दों का सबसे बड़ा बाजार भी तो यहीं हैं. ख़बरों के लिए रातभर जूझते पत्रकार, जो देश की दशा और दिशा बदलने का ख्वाब अपनी हर रिपोर्ट के फ़ाइल होने के साथ देखते हैं. दिल्ली में देश के उन राजनेताओं के ख्वाब भी तो बंद हैं जो बदलाव का संकल्प लेकर सत्ता की गद्दी पर काबिज होते हैं और आते ही अपना वादा निभाते हैं. बदलाव का वादा याद रखते हैं और शुरुआत भी खुद से करते हैं... पहला बदलाव जितना खुद में हो सके करते हैं और ज्यादातर पुराने वादे भुला देते हैं.

Pic Courtesy: Amit Pathe


देश की फास्ट एंड फ्यूरियस यंग जेनेरेशन भी तो मिलती है यहां. मेट्रो की भीड़ में हर शख्स का अपना अंदाज है. एक अल्हड़ तो दूजा समझदार.. कुछ नासमझ भी मिलते हैं. अपनी ही धुन में खोए इन युवाओं को बहुत कुछ चाहिए. दिल्ली के अल्हड़ अंदाज में जब-जब इनका आशिकाना अंदाज घुलता है सबकुछ गुलजार हो उठता है. कहीं लिव-इन से कोई दरकार नहीं, तो कहीं नजर उठाते ही लिव-इन के पैरोकार मिल जाएंगे. कुछ किस्मत बनाने आते हैं यहां तो कुछ किस्मत बन जाने आते हैं. फिर भी दिल्ली को समझ पाना इतना आसान नहीं. दिल्ली एक पहेली है. एक अलबेली दिल्ली... किसी खूबसूरत लड़की की तरह इठलाती हुई, तो कभी किसी भोली सूरत की तरह शर्माती हुई.. कभी नई दुल्हन की तरह सजी दिल्ली तो कभी टूटी प्रेमिका सी दिखती दिल्ली.
   यहां कई लोगों को अपना पहला प्यार भी मिलता है तो दिल टूटने का पहला एहसास भी यहीं... ये शहर सिर्फ एक शहर नहीं एक ऐसी ब्लैक एंड व्हाइट पेंटिंग है जिसमें सभी रंग है लेकिन सामने नहीं. कभी-कभी बेहद रंगीन नजर आती हुई पेंटिंग तो कभी किसी कमरे के किसी कोने में रखी तन्हा बेरंग पेंटिंग की तरह नजर आती है.. खैर, इस शहर की अपनी ख़ूबसूरती है, जिसे ढूंढते-ढूंढते मैंने एक साल गुजार दिया. बहुत कुछ पाया है इस शहर में, कुछ दोस्त, कुछ जज्बात और कुछ जिंदगी के पन्ने में जुड़े नए तजुर्बे... अभी बहुत कुछ पाना बाकी है. अब सपनों की इस नगरी ने कुछ 'सपने पूरे होने का ख्वाब' देखने का हक तो दिया ही है...

(भावना तिवारी- it’s all about feelings)

2 Responses so far.

  1. indeed .. so i usually called it "WONDERLAND" .... !!

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