समाज और मान्यता का टकराव ....


सरकार कन्या हत्या को रोकने के लिए कई अभियान चलाती आ रही है और कुछ परिवार भी इसमें साथ दे रहे हैं I इस अभियान में साथ देने वाले परिवारों में से  एक परिवार हमारा भी है I एक गम्भीर विषय होने के साथ साथ यह एक गंभीर मुद्दा भी है, देश के कई हिस्से आज भी ऐसे हैं जहाँ लडकियों के पैदा होते ही उन्हें मार दिया जाता है I एक तरफ जहाँ लड़के के होने पर चारो तरफ बधाइयां गूंजती हैं वही दूसरी तरफ लडकी के पैदा होने पर चारो तरफ मातम छा जाता है I  लेकिन इसका मतलब यह नहीं के हर जगह इस तरह की कुरीति को मान्यता मिली हुई है I  लडकियों के पैदा होने पर एक तरफ जहाँ दुःख में तवा बजाया जाता है वहीं दूसरी तरफ हमारा घर इस ख़ुशी के आने से खुश था और मिठाइयाँ बांटी गयीं I लडकियों के लिए हमेशा समाज ने बोझ होने की बात कही है, वहीं दूसरी तरफ हर परिवार और समाज इस बात को स्वीकार नहीं करता I इस बात को  हमारे परिवार ने भी आत्मसात करने से मना कर दिया I उनके पास इस बात को सिरे से नकारने का एक सटीक कारण है, और वो है अपने परिवार के लिए भावनात्मक संबल के रूप में काम करना, ऐसा नहीं है के बिना किसी ख़ास वजह के लोग किसी कुरीति को खत्म करने का प्रण करते हैं I मेरे माता पिता ने बेटे और बेटी दोनों का सुख भोगा है और शायद जिस आर्थिक सम्बल की आवश्यकता उन्हें है वह उनके बेटे से ज्यादा उनकी बेटी ने दिलाई है I उनका कहना है के बेटे ज़रूर अपने माता - पिता को एक स्तर पर आर्थिक संबल प्रदान करते हैं पर जो आर्थिक सम्बल उन्हें बेटी के रूप में मिला है उसे वे तबतक सहेजकर रखना चाहते हैं जबतक यह आर्थिक सम्बल किसी और के लिए भावनात्मक सम्बल बनकर उनके घर की शोभा ना बढाये I किसी लडकी का जीवन परिवार के लिए अभिशाप नहीं बल्कि वरदान है I 
एक बेटी अपने रूप में कई रिश्ते समेटकर रखती है, हर तरफ से निराशा से घिरे होने के बावजूद आशा की किरण बिखेरती है I शायद हम ना होते तो पापा की परमानेंट नौकरी ना लगती, शायद अपना घर ना होता और सबसे बड़ी बात शायद एक बेटी के माता-पिता होने का सौभाग्य उन्हें ना मिल पाता I अपनी बात को और पुख्ता करने के लिए वे तर्क देते हैं के शाश्त्रों में बेटी को देवी का रूप मन गया है और उसका विवाह करने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति होती है, कहीं पर भी बेटी के जन्म को अभिशप्त नहीं माना गया है I  भावना नाम रख देने के पीछे भी बहुत से कारण है, एक बेटी से ये उम्मीद करी जाती है के वह अपने माता-पिता की भावनाओ की कद्र करेगी और उनका ख्याल रखेगी...समाज में एक कहावत बहुत प्रचलित है के एक बेटी दो परिवारों को जोडकर रखती है और शादी के बाद भी बेटी अपने बेटी होने का फ़र्ज़ निभाती है I अगर हम ना होते तो ना ही मेरा भाई एक बहन का भाई ना कहला पाता और ना ही किसी के लिए खूबसूरत सी गुडिया ला पाता I हर काल, हर देश और हर समाज के अपने नियम कानून होते हैं पर उनपर बिना विचार करे अपने जीवन में उतर लेना किसी भी तरह से हमारी सामाजिक मान्यता को सही नहीं ठहरता I 
 यह सही है के अपनी कोमलता के कारण कई तरह से परेशानियों का सामना करना पड़ता है पर उस वजह से किसी अबोध के जीने का अधिकार छीन लिया जाये यह किस हद्द तक सही है, अपने वंश को आगे बढ़ाने के नाम पर जिन अबोध बालिकाओं की बली चढ़ा दी जाती है उन्ही बालिकाओं के एक नवयुवती बन जाने पर वंश को अपना वंशज मिलता है I वंशवाद के नाम पर एक अबोध की बली दे देने से बेहतर है के उन परिवारों से सीख ली जाये जो अपने घर की बेटियों को इश्वर का वरदान मानकर उन्हें अपनाते हैं और उनके अस्तित्व की रक्षा करते हैं I शायद हम ना होते तो हमारा परिवार अपने खानदान की एकलौती बेटी का सुख ना भोग रहा होता, समाज की कुरीतियाँ जिस तरह इस एक परिवार पर हावी नहीं हो पाया उसी तरह समाज के कई परिवार ऐसे हैं जो अपने वंश को आगे बढ़ाने के नाम पर हो रहे इस अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का सहस करते हैं और समाज को एक नयीं दिशा में ले जा रहे हैं I   

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10 Responses so far.

  1. Anonymous says:

    Nice 1 Bhawna, kash sabhi log isko smjh pate "एक बेटी अपने रूप में कई रिश्ते समेटकर रखती है".
    .
    (N!k)

  2. acha likha hai pad kar acha lga

  3. अच्छा है गंभीर प्रयास

  4. @mukul sir: shukriya sir...

  5. @target: thanx 4 liking dear...

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