Khamoshi....D!l k! baat

कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो...

ये दिल सुन रहा है, तेरे दिल की सदा


एक बहुत खूबसूरत गीत है "कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो...क्या कहना है क्या सुनना है" शायद ये एक गीत हर बात यूँही इशारों में कह जाता है I कुछ सालों बाद मनीषा कोइराला और सलमान खान की फ़िल्म "ख़ामोशी" ने लोगों को खामोश कर दिया, शायद उस एक फ़िल्म ने लोगों के मुँह पर ताले जड़ दिए और उन्हें रिश्तों को समझने पर मजबूर कर दिया I ख़ामोशी शब्दों से ज्यादा दिल की गहराई में उतर कर हमपर हावी हो जाती है और हम ना चाहते हुए भी उस ख़ामोशी की तरफ खिंचते चले जाते हैं I लोगों से सुना था आँखें बेजुबान होते हुए भी दिल की बातें बोल जाती हैं, जब खुद ये बात महसूस  की तो लगता है शायद इस ख़ामोशी में भी कई राज़ छुपे होते हैं I 
लोग कहते हैं के मेरी बातों में गहराई नहीं है, ना ही मैं किसी गंभीर मुद्दे के बारे में लिखती हूँ, और शायद अभी भी मुझमे बचपना है....तो मेरा खुद का ये मानना है के गंभीर मुद्दों के बारे में हर कोई लिखता है और हर कोई सुनता है पर कितने हैं जो ज़िन्दगी की छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते हैं और उन्हें लोगों तक पहुंचाते हैं I शायद  हाँ...मैं अभी भी बच्ची हूँ और अभी भी अपना बचपना जी रही हूँ क्युंके ये बच्चा ही मुझे लोगों तक पहुँचाता है और लोगों के चेहरे पढने में मदद करता है I बस चलते-चलते अगर थोडा सा ध्यान दिया जाये तो बहुत कुछ है ज़िन्दगी में, कभी-कभी इतने बातूनी लोग मिल जाते हैं के कान में रुई डालने का मनं करने लगता है पर फ़िर भी हम मंत्र-मुग्ध से उनकी बातें सुनते रहते हैं...बिल्कुल  "जब वि मेट" की "गीत" की तरह, याद है ना पटर-पटर बोलने वाली वो लडकी और कभी ऐसे जिन्हें देखकर लगता है के क्या कभी ये बोलते भी हैं या गलती से हस्ते भी होंगे,बिल्कुल "आलमआरा" फ़िल्म की तरह साइलेंट I 
मैं रोज़ सुबह-सुबह यूनिवर्सिटी के लिए निकलती हूँ और हजारों तरह के लोगों से सामना भी होता है...किसी-किसी को देखकर लगता है मानो कोई रिश्ता हो और कोई तो इतना सिरिअस के उसकी तरफ देखकर हसने से भी दिल डरता है I 
रोज़ ऑटो में आने -जाने में एक उलझन  सी होने लगती है, अगर इस सफर को थोडा मज़ेदार बना दिया जाये तो ये उलझन कम हो जाती है और बहुत कुछ नया सामने आता है I पटर-पटर बोलने वाला इंसान तो आसानी से नजर में आ जाता है पर कुछ ऐसे होते हैं जो ख़ामोशी की चादर ओढ़े चुप-चाप बैठे रहते हैं I हमें लगता है के वो शख्स घमंडी है पर शायद सचाई इससे कोसों दूर होती है, शायद उस ख़ामोशी के पीछे एक राज़ होता है I कोई उस ख़ामोशी के सहारे अपनी ज़िन्दगी को कोस रहा होता है या किसी ख़ास को याद कर रहा होता है I पर ख़ामोशी का एक कारण ज़रूर होता है...
कई बार ख़ामोशी आने वाले तूफ़ान की तरफ इशारा करती है, और कई बार दिल में उठ रहे जज़्बातों के सैलाब की तरफ I पर ख़ामोशी में कुछ ना कुछ ज़रूर छिपा होता है, कभी-कभी बगल में बैठे उस अनजान शख्स की आँखों के कोने में छुपे आंसू आपको भी रोने पर मजबूर कर देंगे तो कभी किसी के आँखों की चंचलता आपको किसी अपने की याद दिला देंगे जो आपको हसने पर मजबूर कर देता था....ख़ामोशी कभी टीस, कभी दर्द, कभी जुदाई, तो कभी प्यार की याद दिला देती है I ख़ामोशी ना चाहते हुए भी ज़िन्दगी में एक आवाज़ घोलती चली जाती है....चाहे वो आवाज़ सुरीली हो या कर्कश पर उस आवाज़ को महसूस करने की शर्त ये है के आपको उस आवाज़ पर ध्यान देना होगा I 
इस लेख को लिखने के पीछे कोई ख़ास मकसद नहीं बस रोज़ लोगों की भीड़ में चेहरे पढ़ते हुए सबकी ख़ामोशी के पीछे छुपे राज़ को पहचानना एक आदत बन गयी और इस आदत ने ही शायद मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया I आते-जाते लोगों से बातें करना उनका हाल जानना एक खूबसूरत एहसास है जो ख़ामोशी के एक समुन्द्र से होता हुआ ख़ामोशी के दुसरे समुद्र में जा मिलता है....और कुछ ऐसे एहसास ज़िन्दगी भर दिल में अपना घरोंदा बनाकर रह जाते हैं I
बस एक एहसास, एक खामोशी बांटना  चाहती हूँ आपके साथ, और एक ख़ास बात के अब अगर कोई खामोश शख्स आपके साथ बैठा हो तो उस खामोशी के समुन्द्र में डुबकी लगाकर देखिएगा शायद ज़िन्दगी का एक और रंग चढ़ जाये आप पर I ख़ामोशी की चादर इतनी भी मोटी नहीं होती के किसी का दिल ना छु  पाए, इस खामोशी से दिल लगाकर तो देखिये...

"खामोशी की चादर हटा कर तो देखो
कभी पास मेरे आकर तो देखो
बहुत कुछ कहती है खामोशी मेरी
कभी इस खामोशी से दिल लगाकर तो देखो"

8 Responses so far.

  1. pramod says:

    amejing u r suparb intjar ka fal achcha diya

  2. bhut acha likha hai..pata hai idhar kuch dino se tum to janti ho thoda door ka safar kr rhe hai roz...to hmne bhi ye aadat dal rkhi hai jab aas paas baithe kisi insan ko samjh nahi pate to puch baithte hai,..abhi kuch din phle...ek ladka bhut khush andaz se muskura rha tha...hum bhut der tak use dekhte rhe aur samjhne ki koshish ki...mujhe laga sayad uski aaj hi job lagi hai...akhir darte hue . dare isliye ki tum janti ho akele door ke safar me thoda reserve rhna padta hai..jab poocha to mera shak sahi nikla ...uski wipro me joblgi thi usi din...hahahah wo bhut khush hua ye jankr ki hum samjh gye uske chre me chupi khusi........................so i agree ki khamosi me dum hai..

  3. @shubhi: achcha lga ke tumne bhi ye baat mehsus ki..

  4. - अच्छी रचना बहुत कुछ कहती हुई -
    "खामोशी की चादर हटा कर तो देखो !"

    'इस ख़ामोशी में न छुप जाये.. बातों का सबब,
    खामोश बातों को थोरा बता के देखो ....

  5. ख़ामोशी में बहुत कुछ छिपा होता है सही लिखा है आपने| धन्यवाद|

  6. Anonymous says:

    Really nice one bhawna..... khaskr wo last stanza.....


    (N!k)

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