अनसुलझी पहेली...



"मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया...
हर फिक्र को धुएं में उडाता चला गया...
बरबादियों का शोक मनाना फ़िज़ूल था...
बरबादियों का जश्न मनाता चला गया..."



प्रेम - पुजारी  फ़िल्म  की ये पंक्तियाँ खुद में बहुत कुछ कह जातीं  हैं...शायद ये चन्द लाइन उस शक्स  को समझने  में मदद कर सके जिसके बारे में मैं आज तक समझने की कोशिश  कर रही हूँ    I   अब धुआ उड़ने से ये न समझ बैठिएगा के सिगरेट  पी  और धुआं   उड़ गया.... किसी के बारे में कुछ लिखना उतना ही मुश्किल काम है जितना एवेरेस्ट पर चड़ना  I    किसी के बारे में कुछ भी लिखने का मतलब है उसका प्रतिबिम्ब कागज़ पर उकेर कर रख  देना, पर इस काम को करना कोई आसान बात नही ....आज  यूँही  बैठे  बैठे  एक    काम मिल    गया, किसी के भी बारे में लिखने को कहा   गया .....पर आज  तक  किसी के भी बारे में इस तरह  सोचा  ही नही के कुछ लिखा  जाये ...


किसी  के  बारे  में लिखने  के  लिए  सोचा   तो  बस  एक  चेहरा  आँखों  के  सामने  उभर  आया , वो  चेहरा  था हमारे  साथ  पढने  वाले  मनीष  का...सोचा क्यूँ न इसीके ऊपर कुछ लिख दिया जाये, वैसे भी दिमाग के किसी कोने में था के एक दिन कुछ तो जरुर लिखूंगी इसको लेकर, तो  क्यूँ न आज ही  लिख डालूं  I  खुद में बहुत उलझा  हुआ  चरित्र  है, एक  बार  देखने  और  बात   करने  पर  तो  समझ  ही  न  आये  के  आखिर  ये  इंसान  है  क्या ! उसके   चलने   का  ढंग  हो  या  बोलने  का  ढंग  , उसकी  हर  बात  उसे  दूसरों   से  बहुत अलग  बनती  है I  उसके  बारे  में लिख  पाना  किसी  कठिन  परीक्षा  से  कम  नही ….. 
तो  हम  बात  कर  रहे  हैं  मनीष  की ….जब  पहली  बार  उससे  मिली  तो  कोई  ख़ास  बात  नही  हुई  उससे , न ही कुछ ज्यादा जानने  का मनं था  I   बस  वही  फ़ॉर्मल  बातें  जो  एक  क्लास  में  हो  सकती  हैं …क्लास  से  बाहर  निकलने  के  बाद  भी  कोई  ख़ास  रिश्ता  नही  रहा, न ही दोस्ती का न ही कोई और I   इतना पता था के ये मेरे साथ पढ़ता  है, बस   यूँही  दो  साल  बीत  गये  I एक  साथ  पढ़ते  हुए  भी  हम  एक -दुसरे  के  बारे  में  कुछ  नही  जानते  थे  I पर एक बात थी....उसका  चलने  का  अंदाज़  सभी  से  अलग  था , जिसपर  बहुत  बार  मैंने  ध्यान  दिया ….दुनिया  से  बेखबर , दुनिया  के  रस्मो - रिवाजों   की  परवाह  न  करते  हुए  खुद  में  ही  मस्त  रहता  था  I बड़ा  अजीब  सा  लगता  था …खैर  हम  क्या  कर  सकते  थे !
बहुत अलग अंदाज़  है उसके  बोलने  का - "गुरु  जी  प्रणाम" दूर  से ही पता  चल  जाता  है मनीष  आ  गया....एकबारगी  तो  ऐसा  लगता  है  जैसे  इस  लड़के  को  दुनिया  जहाँ  की  कोई  परवाह  ही  नही  I बातें  ऐसी  करता  जैसे  सब  पता  हो  उसे , हम  तो  हमेशा  सोचते  हैं  के  अगर ये  नेता  होता  तो  जनता  के  वोट  इसी  को  मिलते  I इसके  इस  बहरूपिये  रूप  को  देखकर  मुझे   ग़लतफहमी  थी  के  इसके  लिए  शायद  रिश्तों  के  मायने  नही  है , पर  कुछ  ऐसा  हुआ  जिसने  मेरी  सोच  बदल  दी  और  मुझे  सोचने  पर  मजबूर  कर  दिया   के  अगर  ये  रिश्तों    के  मायने  ना  समझता  तो  शायद  इसके  साथ  ऐसा  ना  होता …
दोस्ती के मायने बहुत ज्यादा हैं इसके लिए, एक अल्हड-मस्तमौला युवक की परछाई सी दिखती है....जिसे देखकर ऐसा लगता है की मानो ये उस युवा पीढ़ी का नेतृत्व कर रहा हो जो  अपनी हर ज़िम्मेदारी से बेपरवाह सी दिखती है...पर सचाई कुछ और ही होती है  I  ना जाने कौन - कौन से सपने इन आँखों में सजे होते हैं और एक ठोकर जो धोके की बुनियाद पर रखी गयी हो...उन सपनो को चकनाचूर कर डालती है  I जब इसकी बातों को समझने बैठो तो ऐसा लगता है मानो कोई खुली किताब सामने रख दी गयी हो, जिसे पढ़ा तो जा सकता है पर समझना कहीं ज्यादा मुश्किल है  I ज़िन्दगी का ऐसा कोई पहलु नही जो कभी भी किसी से छुपाया हो, पर फिर भी इसके मनं को टटोल पाना नामुमकिन सा लगता है  I
शायद ज़िन्दगी की सचाई को करीब से देखा है उसने.. किसी तपिश से कभी तो वास्ता हुआ है उसका, ज़िन्दगी की सचाई से वाकिफ है वो पर फिर भी एक जिद है बात न समझने की I कभी उदास नही देखा पर हाँ बातों में कभी - कभी कुछ नज़र सा आता है जो छुपा हुआ सा है दिल के किसी कोने में I कभी - कभी बहुत बोलता है, इतना  के चुप करना मुश्किल हो जाता है I उसे देखकर लगता है कितनी बेखबर और आजाद ज़िन्दगी है इसकी , ना किसी परवाह ना चिन्ता I कभी कभी उसे देखकर एक बहुत पुराना गीत याद आता है....
"बन  का पंछी बन बन मैं  तो डोलूं रे 
कुछ ना बोलूं रे..."
कभी मिलकर  तो देखिये हमारे इस दोस्त से, ज़िन्दगी के नए रंगों से आप वाकिफ ना हो जाएँ तो कहियेगा..... शुक्रिया अदा करेंगे आप मेरा के किस पहेली से वास्ता कराया है आपका  I पर कुछ भी कहिये कुछ तो ख़ास है उसमे जो हर किसी को अपनी तरफ खींच लेता है I  





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6 Responses so far.

  1. .........भावना जी मैं आपकी बात से काफी हद तक सहमत हूँ.लेकिन आपने सिर्फ उसके बड बड को ही नोटिस किया कभी उसको वहाँ से समझने की कोशिश तो कीजये जहाँ से वो खामोश होता है...

  2. भावना पूरा व्यक्तित्व चित्रण नहीं हो पाया है काफी कुछ कम है हमें इन्तिज़ार है पूरे व्यक्तित्व का
    आभार एवं बधाई

  3. pramod says:

    poori baat nahi kah payi ho jo cheej batane ki thi wo to kahi bhi padne ko nahi mili,ansuljhi paheli title aur kahani poori tarah se mail nahi kha rahi hai,but kosis jari rakho

  4. @ashish: koshish krungi aur achcha krne ki

  5. @pramod: aapki baat dhyaan me rkhungi agli baar

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