To my dearest chaachu.........


परम पूजनीय चाचा जी,
सादर प्रणाम
यहां सब कुशल मंगल है, आपकी कुशलता चाहने हेतु इश्वर से प्रार्थना करती हूं..... आज पत्र लिखने का ख़ास कारण यह है कि बैठे-बैठे यूँहीं ख्याल आया कि फोन और मोबाइल के युग में होते हुए भी लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में असमर्थ हैं, तो सोचा जो बातें मैं सामने नहीं बोल सकती वो कागज़ के छोटे से टुकड़े पर उकेर सकूं. शायद इस पत्र से दुनिया की हर वो भतीजी या फिर कोई भी खुद को जोड़ सके जो अपनों से दूर है...
आप हमेशा से ही मेरे प्रेरणा स्रोत रहे हैं, आपको लिखते देख मुझमें भी लिखने की इच्छा जगी... आप मेरे पहले गुरु हैं जिन्होंने मुझे इस जीवन की सचाई से वाकिफ कराया. जब मैंने पत्रकारिता को अपना जीवनलक्ष्य बनाया तब लोगों ने मेरे इस फैसले पर सवाल उठाये पर आपने मेरा साथ दिया और साथ ही साथ समझाया कि अगर आगे बढना है तो मुझे मेहनत करनी होगी. आपने बचपन से ही एक दोस्त की तरह मेरा साथ दिया..
जब भी किताबों में चाचा जवाहर लाल नेहरु का ज़िक्र आता मुझे हर बार आपकी याद आई क्यूंकि वो हमेशा ही बच्चों को प्यार करते थे.. उन्होंने समाज के लिए भी बहुत कुछ किया समाज के निर्माण में उनका सराहनीय योगदान भुलाया नहीं जा सकता. उसी तरह से आप बच्चों को बहुत प्यार करते हैं और हर मोड़ पर उनका साथ देते हैं, एक पत्रकार के तौर पर आप जो कुछ भी समाज के लिए कर रहे हैं वो सराहनीय है. चाहे वो आपके ब्लॉग के माध्यम से सामजिक समस्याओं की तरफ इशारा हो या एक पत्रकार के तौर आपकी कठिन मेहनत, इन दोनों ही बातों से आज की युवा पीढ़ी और मुझे बहुत कुछ सिखने को मिलता है जब लोगों से आपके बारे में सुनती हूं तो एक सुखद अनुभूति का एहसास होता है ...
कहना तो बहुत कुछ चाहती हूं लेकिन शब्दों की कमी है.... उम्मीद है आपको मेरी भावनाओ का भान होगा...अब पत्र यहीं समाप्त करती हूं. आपके उत्तर की प्रतीक्षा में,
आपकी लाडली 
भावना


(भावना तिवारी- its all about feelings)

6 Responses so far.

  1. भावना आप सबसे पहली हैं जिन्होंने अपना काम पूरा किया इसके लिए बधाई लेकिन पत्र बहुत सपाट गया प्रयास सराहनीय है पर मैं इससे बेहतर की उम्मीद कर रहा था
    आभार

  2. Sir aapke comment ke liye shukriya, aage se aur bhi behtar krne ki aur aapki ummedon pr khraa utarne ki koshish krungi...

  3. बहुत औपचारिकता से शुरुआत किए हुए तुम्हारे पत्र को जैसे-जैसे पढ़ता गया खुद उसमें गहराई से जुड़ता गया। मैं खो गया बचपन के उन दिनों में जब ईजा से दूर लखनऊ में रहता था और गांव पत्र भेजने के लिए तुम्हारे पापा यानी मेरे बड़े भाईसाहब मुझे लिखना सिखाते थे। एक दिन उन्होंने एक अंतरदेशीय पत्र खरीदा, एक तरफ खुद पत्र लिखा और दूसरी तरफ लिखने के लिए मुझे दे दिया। मैं संभवत: आठवीं में पढ़ता था। अंतरदेशीय पत्र हाथ में रखकर कुछ देर अवाक सा रहा। मैं डरता बहुत था। फिर भैया ने कहा, लिखता क्यों नहीं। मैंने पेन मांगा और लिखना शुरू किया, परम पूज्यनीय (उन दिनों हिन्दी की कुछ अज्ञानता के चलते पूजनीय को पूज्यनीय लिखा, कई सालों तक) माता जी को हम दोनों की नमस्कार पैलागुन। भुवन और केवल की ओर से नमस्कार।
    यहां कुशल सब भांति सुहाई, तहां कुशल राखे रघुराई। (इस पंक्ति को तुम्हारे पापा लिखा करते थे जब गांव को हमारे लिए पत्र लिखा करते थे, विस्तार से बातें मेरी दैनिक डायरी में दर्ज हैं, जैसा कि तुम जानती हो मेरा डायरी लिखने का शौक बहुत पुराना है और कई डायरियां भर चुकी हैं)
    यहां सब ठीक है, केवल भी अब पहले से ज्यादा समझदार हो गया है। बाकी घर में क्या हाल चाल है। भैंस दूध दे रही है या नहीं। मौसम कैसा हो रहा है..... वगैरह, वगैरह। और अंत में आपकी बेटी पुष्पा।
    अब तुम्हें लगेगा, ये मैं क्या लिख रहा था और क्या लिख रहा हूं। भैया ने भी इसे पढ़ लिया था। वे मुस्कुराए। चिठ्ठी चिपकाई और लेटर बॉक्स में डाल दी। बाद में पूछा तूने वो क्या लिखा था। मैंने कहा, दीदी ने ऐसे ही बताया था। उन्होंने कहा, अरे जब दीदी लिखवाएगी तो ऐसे ही लिखवाएगी, तू अपनी तरफ से लिखेगा न। चल आगे से ध्यान रखना। धीरे-धीरे मैं खुद पत्र लिखने लगा। पत्र लिखने का इतना शौक चर्राया कि मेरी पत्रकारिता एक प्रकार से पत्र लेखन से ही शुरू हुई। मैं उन दिनों दीदीयों से, अन्य परिजनों से पत्र लिखने की जिद करता था। आज भी करता हूं। कई बार मन करता है तो पत्र लिख भी देता हूं। दो-तीन साल पहले जब गांव गया तो वहां से अपने बचपन के लिखे पत्रों को सहेज कर ले आया। पत्र लेखन से शुरू हुई मेरी पत्रकारिता आज यहां तक पहुंची है। उन दिनों दैनिक जागरण में हर दूसरे दिन मेरा पत्र छपता था। आज तक वे प्रतियां मेरे पास हैं। फिर सहारा में मुझे बेहतरीन पत्र लिखने का पुरस्कार मिला। कॉलेज की पत्रिकाओं में लिखने लगा। और धीरे-धीरे यही लेखन और इससे जुड़ी प्रक्रिया मेरी रोजी बन गया। खैर यह रही मेरी बातें। फिर सवाल उठे कि पत्रकारिता में डेस्क जॉब क्यों चुना। इसके निहितार्थ अनेक किंतु परंतु हैं। अब बात आती है तुम्हारी। हर राह में कई सारी दिक्कतें आती हैं। कहीं हम संवेदनशून्य नजर आते हैं और कहीं अति संवेदनशील। कई बार अखबार में काम करते हुए हमें लगता है अरे आज कोई लीड खबर नहीं है। फिर अचानक खबर आती है कि अरे ट्रेन हादसा हो गया है। कोई पूछता है कितने मरे, फिर जवाब आता है कोई नहीं। एक प्रतिक्रिया आती है, धत तेरे की। यानी फिर लीड की समस्या यथावत। यहां पर हम संवेदनशून्य से नजर आते हैं। कहीं पर किसी हादसे के पीछे के कारण उससे प्रभावित लोगों की बातें, उनकी समस्याएं हम इस तरह उठाते हैं कि उनका कुछ फायदा होता है पीड़ित या उसके परिवार को। यहां पर हम संवेदनशील नजर आते हैं। हमारी राह में कई लोग ऐसे लगते हैं वाकई ये हमारे अच्छे खैर ख्वाह है। यहां पर हमें अति भावुक और अति कठोर होने की जरूरत नहीं होती। पारिवारिक दायित्वों, पारिवारिक संस्कारों को ध्यान में रखते हुए हमें अपने कर्त्तव्य पथ पर चलते रहना चाहिए। उन्न्ति और अवनति पर विचलित होने के बजाय आगे का सफर देखना चाहिए। ब्लॉग की शुरुआत की है, अच्छी बात है। निरंतर पोस्ट करो। कमेंट की परवाह मत करो। बस ध्यान रखो की तुम्हारे लेखन को सैकड़ों लोग भी पढ़ सकते हैं और कोई भी नहीं। बातें फिर होती रहेंगी, फिलहाल इतना ही...
    तुम्हारा चच्चू
    केवल
    ktki kanw-kanw.blogspot.com

  4. बहुत अच्छा भावना,तुमने अच्छा पत्र लिखा है....और मुझे लिखना भी सिखा दिया.उम्मीद है आगे कुछ और भी बेहतर पत्र पढ़ने की उम्मीद करता हू.....

  5. @kewal tiwari: शुक्रिया चाचू, तुम्हारी और पापा कि बचपन कि बातें सुनने मे बडा ही मजा आता है.. बहुत कुछ सिखने को भी मिलता और सच है के मेरी सभी रचनाओ में आपदोनो का सहयोग होता है प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से...कोशिश करुंगी के आगे और अच्छा लिखुं और आप सभी कि उमीदों पर खरी उतर सकूँ

  6. @ashish: शुक्रिया आशीष..

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