एक प्याला मिठास का हो जाये !!!!!




मुदे ताई पीनी है...
एक प्याला चाय और उसके हजारों नाम...उत्तर प्रदेश के मुहल्लों में नामक कि पतली चाय, हरयाणा के ढाबे में गाढ़ा दूध और प्यार से डाली शक्कर कि चाय , मालवा कि 'सुपर स्पेशल' या फ़िर 'कट', मुंबई कि 'कटिंग' या फ़िर दिल्ली  कि 'मलाई मार के' बिना चाय के ज़िन्दगी कि हर याद..हर पल अधुरा है, दोस्तों के साथ तफ़री हो या ज़िन्दगी का कोई ऐसा पल जब आँखों से आंसू छलक पड़े हों...बस यूँही ये यादें एक चाय के प्याले से...जैसे ज़िन्दगी बस गयी हो इस प्याले में...गरमा गरम चाय और आप अपनों के साथ...मैं उत्तराखंड के एक गाँव से सम्बन्ध रखती हूँ, जहाँ चाय को 'चहा' बोला जाता है और वहां चाय सिर्फ एक पेय नहीं बल्कि वहां कि संस्कृति का एक हिस्सा है... पता नहीं इस चाय कि चाहत कहाँ से शुरू हुई और ठंडे पहाड़ों कि ज़रूरत बन गयी...पर हाँ कुमाऊँ में सुबह चाय से शुरू होकर रात भी चाय पर समाप्त हो जाती है....
चौबीस घंटे हर वक़्त बस चाय ही चाय...मेहमानों से चाय पूछी नहीं जाती बस पिला दी जाती है, मेहमान आये तो सबसे पहले उसे चाय पिलानी है, इसमें पूछने वाली कौनसी बात है और अगर गलती से पूछ तो मतलब आप नहीं चाहते के वो रुके...चाय के लिए पूछना असभ्यता मानी जाती है, बस स्टील के बड़े से ग्लास में खोलती हुई चाय गुड के साथ सामने रख दी जाती...जिसे वो रुमाल से पकडकर अपने होठों तक ले जाने का दुसाहस करता है, फ़िर चाय को फूंक मरता हुआ उसे पीने कि कोशिश करता है...ये है चाय पीने का पहाड़ी स्टाइल...पर इससे भी मज़ेदार ये के जब मेरी मामी खेत में गुड़ाई के लिए जाती तो अपने साथ लोटा भरकर चाय ले जाती और बड़े ही मज़े से लोटा भर चाय पीती जैसे कोई अमृत का घडा मिल गया हो...
हमारी शुभी चंचल 
ख़ैर ये तो रही पहाड़ों कि बात, अब ले चलते हैं आपको तोताराम कैंटीन, पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के बच्चो का असली ठिकाना...बस क्लास ख्त्म होते ही सबका जमावड़ा वहीं लगता है, कुछ फालतू कि बातें, कुछ प्यार- मोहब्बत, कुछ रूठना-मनाना और इस तरह यादों का एक घरोंदा बनाने कि शुरुआत...कुछ इसी तरह कि शुरुवात हमारे साथ भी हुई थी, तब हमारा ठिकाना था आर्ट्स कैंटीन...जहाँ ये सिलसिला शुरू हुआ अनमता, नेहा, प्रान्षा, कपूर, मनोज, निखिल और गेविन के साथ...पर धीरे धीरे सब अपने काम में व्यस्त हो गये और ये सिलसिला यादों में कैद हो गया ...धीरे धीरे वक़्त बीता और फ़िर शुरू हुआ चस्का तोताराम  कैंटीन का...अब हमारे इस कारवां में शामिल थे कुछ नए चेहरे शुभी, और प्रियंका...
नेहा,अनमता,भावना,प्रियंका

डिपार्टमेंट के सामने सीड़ियों पर बैठकर हस्ते खिलखिलाते चाय कि चुस्कियां लगाते, कभी इतना सन्नाटा हो जाता जैसे ना जाने क्या हो गया हो और कभी कभी इतना हस्ते के सीडियों से गिर पड़ते...कभी कभी यूँही आँखों में आंसूं आ जाते के ना जाने आगे क्या होगा....जब हम उस जगह से हट जाते तो एक नया दोस्तों का टोला आकर वहां बैठ जाता और अपनी इस कॉलेज लाइफ को इन यादगार पलों से सजाने लगता....यहाँ एक बात बताना चाहती हु के हमारी ये सीडिया हीरे-मोती से भी बहुमूल्य है, हर कोई नज़रें गड़ाए वहां खड़ा रहता है के कब वहां बैठने को मिले... वहां बैठकर चाय पीने का अपना ही मजा है, हमारी शुभी जी के हसने का अंदाज़ इतना प्यारा है के जब वो हस्ती हैं तो बस सब देखते ही रह जाते हैं...
नेहा,भावना 
कई बार तो एक-दुसरे पर उधारी भी चड़ जाती और चाय के साथ गरम समोसे, मुँह में पानी आ जाये...कई बार कसमें खायी के आज समोसा नही खाएँगे पर क्या करें दिल तो बच्चा है जी,दिल है कि मानता नहीं... आपने कई तरह कि लड़ियाँ सुनी होंगी पर चाय के लिए लड़ाई सुनी है क्या? नहीं ना, यही तो ख़ासीयत है हममें चाय के लिए भी लड़द पड़ते हैं पर उसके बाद जो मनाने का सिलसिला चलता है उसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता...कई बार एक ही ग्लास से चाय पी लेते और बाद में एक-दुसरे को मुँह चिड़ाते...देखने वालों को लगता कि कैसी लडकियाँ हैं, पर सच ये है के इन छोटी -छोटी प्यारी यादों को याद करके यूँही ज़िन्दगी कट जाएगी...
नहीं पता के कल हम सब साथ होंगे या नहीं पर आप सभी को अपनी इन हसीन यादों से रूबरू कराना चाहती हूँ, और चाहती हूँ आप सब भी थोडा बच्चा बनकर देखिये मजा आता है...जब आप अपनी बेतुक्की हरकतों से लोगों को हसाते हैं....मुकुल सर हमेशा कहते हैं कि बच्चे अब बड़े हो जाओ पर सच शायद ये है के कभी-कभी हमलोगों को यूँ चाय कि चुस्कियां लगाते देख उन्हें भी कुछ धुन्दला सा याद आने लगता है, अगर आप कभी लखनऊ विश्वविद्यालय गये हैं या वहां के विद्यार्थी रहे हैं तो आपको भी इस वक़्त कुछ कुछ धुन्दला सा याद आ रहा होगा...
बस अब ज्यादा नहीं...इतना ही कहना चाहती हूँ: 
दोस्ती सिर्फ नाम नहीं कहने को;
एहसास है इसमें जीने को...
कुछ चुस्कियां चाय कि..
वो गरम समोसे कि महक...
पल ना जाने फ़िर कब आएंगे...
बस कुछ हसीन पल याद आयेंगे...

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13 Responses so far.

  1. भावना एक पोस्ट के हिसाब से मैं कहूँ बहुत उम्दा आप वैसा ही कर रही हैं जैसे एक सच्चा विद्यार्थी करता कैसे छोटे से विषय को उठा कर उसे दोस्ती से जोड़ा बहुत बढ़िया
    इसे लिखने का एक तरीका ये भी हो सकता सिर्फ चाय पर फीचर ,छे के बारे में जानकारी प्राप्त कर इस पर भी लिखने की कोशिश करो फिर समोसे के बारे में लिखो यांगिस्तानी बहुत पसंद करेंगे इसका प्रिंट आउट निकालो विभाग में लगवाते हैं

  2. Anonymous says:

    Bhawna tmne is post se hume purane dino ki yaad dila di.....

    Is post ko pdkr mai ye jarur kh sakta hu ki tmhe chai psnd nahi balki tmhe chai se pyar hai....
    .
    .
    (N!k)

  3. bat aisi hai ki sab isse jude hue hai isliye padkr aur mja aya

  4. ek dam kadak....
    i thoroughly enjoyed it.

  5. gud one : Friends r very important of life

  6. oye hum hi mile the....hmmmmm?


    bt bhut acha lga tumhari post ka hissa bankar.....lagi rho.....aur jaldi hi chai pine aayege......

  7. brijesh says:

    it was really a nice experience to see and feel the views...bhawnaji...its awesum blog and great thoughts.... keep it up....

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