इंक्रेडिबल भारतीय रेल


'तो आपको वापिस आकर कैसा लगा? भारत ज्यादा अच्छा है या अफगानिस्तान?'
'सभी जगह अच्छा है. अब ये अपना वतन है तो जुड़ाव तो होता ही है. हां, लेकिन जितना पैसा यहां पच्चीस सालों में नहीं कमाया, उससे ज्यादा वहां कुछ ही सालों में कमा लिया'

'भाई साहब क्या बताएं देश का हाल इतना बुरा है कि डेवलेपमेंट की तो बात ही नहीं कि जा सकती'
क्या कहते हैं आप. अब सरकार अपनी जान थोड़े ही न दे देगी, कर तो रही है जितना कर सकती है. अब हमें भी तो अपनी तरफ से कुछ योगदान देना ही होगा.'

क्यों, क्या लगता है आपको कि ये दो जानने वाले लोगों के बीच हुई बातचीत का एक अंश है. जी नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है. ये भारतीय रेल में यात्रा कर रहे कुछ अनजान लोगों के बीच हुई बातचीत का एक अंश है. इस वार्ता का हर एक शब्द देश और उसमें रहने वाले लोगों के बीच के रिश्ते को उजागर करती है. बेशक यहां उन सभी का जिक्र नहीं किया जा सकता क्योंकि उसे शब्दों में ढालने के लिए भी उतना ही धैर्य चाहिए जितना पढ़ने के लिए. फिर भी इस एक रात या चंद घंटों के सफर को थोड़ा-थोड़ा करके समझ पाना इतना भी मुश्किल नहीं। दो पटरियों के ऊपर दौड़ती ये रेल सिर्फ यातायात में सुविधा के लिए बनायी गयी लोहे की कोई गाड़ी नहीं बल्कि बल्कि देश में बसे एक शहर की तरह है, जहां अलग-अलग संस्कृति को मानने वाले लोग बसते हैं. इस रेलगाड़ी के अलग डिब्बे चाहे ए.सी. हो, स्लीपर हों या फिर अनारक्षित डिब्बे, उन शहरों के कच्चे और पक्के मकान की तरह ही तो हैं जिनके ड्रॉइंग रूम में बैठकर समाज और देश की बातें करते हैं. और कभी-कभी अगर ये बातचीत बाहर बरामदे या छत में हो रही हो तो कभी-कभी पड़ोसी भी इसमें शामिल हो जाते हैं.
पटरियों पर भागता ये शहर भी कुछ इसी तरह का है. शुरूआती चंद मिनटों में तो सामने बैठा शख्स अनजान ही होता है लेकिन वक्त बीतते ही कब वो शख्स बिलकुल अपने ही घर का लगने लगता है पता ही नहीं चलता. शुरुआत होती है, 'नहीं भाई साहब ऐसे नहीं चलता है' के साथ. इसके बाद तो इस चर्चा का सिलसिला बढ़ता ही चला जाता है.आपको क्या लगता है कि सिर्फ संसद में या पंचायत में बैठे लोग ही भारी-भरकम या देश से जुड़े टॉपिक्स पर बात कर सकते हैं. अगर आपको ऐसा लगता है तो आप बिलकुल गलत हैं. कभी ट्रेन के अंदर घुसते ही अपना इयरफोन निकाल कर सामने मुंह चला रहे लोगों की बातों पर कान तो लगाइये. आपकी गलतफहमी दूर हो जाएगी. ये वो लोग हैं जिन्हे उच्च पदों पर आसीन लोग सुनना ही नहीं चाहते. कहा तो जाता है कि आपके सुझाव व आपकी बात शिरोधार्य लेकिन ऐसा कुछ वास्तव में होता नहीं. शायद यही वजह है कि ये लोग अपनी बातें, अपने मतभेद ऐसे लोगों के साथ बांटते हैं जिन्हे ये जानते तक नहीं. अब आप कहेंगे तो भाई ऐसे लोगों से अपनी बातें या अपने विचार बांटने से क्या फायदा? तो जानना जरूरी है कि फायदा तो है. फायदा ये है कि सामने बैठा व्यक्ति भले ही उनकी बात काटे लेकिन बात सुनता भी तो है.
देश के विभाजन, राज्य के विभाजन के पीछे का कारण आम जनता की भलाई बताने वाले लोगों के लिए ये लोहे का बना शहर एक बुलावा है कि एक बार तो आओ. एक बार आकर इन आम लोगों के बीच आम बनकर बैठो तो सही. सारी गलतफहमियां दूर हो जाएंगी'  मुझे हमेशा ही रेल यात्राओं से ख़ास लगाव रहा है क्योंकि वहाँ बहुत कुछ ऐसा जानने और सुनने को मिलता है जिसे मैंने कभी भी चार दीवारी के अंदर बैठकर नहीं सुना होता है. हालांकि, अभी मुझे हर जगह जाने का सौभाग्य नहीं मिल पाया है लेकिन जहां-जहां गयी उस सफर से जुडी मजेदार और सीखाने वाली यादें जरुर समेटती गयी. पूरे सफर के दौरान मैंने जाना कि लोगों की राय सिर्फ वही नहीं है जो नेता बताते हैं, अखबार वाले छापते हैं या टीवी पर दिखाया जाता है. उसके अलावा भी बहुत कुछ है आम लोगों की राय में. जैसे एक अगर सरकार को कोसता है तो दूसरा उसे समझाता है कि कुछ फर्ज हमारा भी बनता है. मुसलमान सिर्फ वो नहीं सोचते जो हमें मानने पर मजबूर किया जाता है, बल्कि देश से दूर होने पर याद तो उन्हें भी आती है. या फिर हिन्दू हमेशा हिंदुत्व के नाम पर कट्टरता नहीं चाहते बस अपने विचारों का सम्मान चाहते हैं.
ये रेलगाड़ी की दुनिया एक ऐसी दुनिया जिसे अगर आपने पहचान लिया तो किताबों से भी ज्यादा ज्ञान हासिल होगा. यहां कट्टरता मिलेगी, सम्मान मिलेगा, अपने एग्जाम्स की तैयारी करते कुछ पढ़ाकू भी नजर आएंगे, अपनी माँ से दूर जाती नई-नई मां भी दिखेगी. जिंदगी का हर वो रंग, हर वो विषय नजर आएगा जिसे शायद हम रोज की आपा-धापी में भूल जाते हैं. कभी नेताओं की बातें, राज्य की बातें, संस्कार की बातें, देश की बातें. बस फैसला आपका है कि आप इयरफोन लगाए डूड, सेक्सी गर्ल या अपने काम से काम रखने वाले अंकल-आंटी बनना चाहते हैं या फिर इस चर्चा में शामिल परिवार का सदस्य बनना चाहते हैं. जो भी फैसला लीजिये, ये जरुर याद रखियेगा कि कुछ सफर जिंदगी को खुशगवार मंजिल तक पंहुचाते हैं और कुछ मंजिलें बाद में सफर बन जाती हैं.

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6 Responses so far.

  1. सच कहा आपने bhawana jee ...कभी कभी तो कुछ ऐसी कहानियाँ बन जातीं हैं कि भुलाये नहीं भूलते...!

  2. बहुत खूब,
    अक्सर बस और ट्रेन में ऐसे सीरियस टॉपिक पे बात होती है,तभी तो मनीष सिसौदिया ने एक बार कहा था की "कभी- कभी ऐसे लोग मिल जाते हैं जिन्हें देख के लगता है इन्हें संसद में होना चाहिए", शायद वे ऐसे ही लोग होते हैं.

  3. सच्चे लेखक के लिए विषय की आवश्यक्ता नहीं होती
    शब्दों को पिरोना शब्दों को उनका रूप देना भले वो सुनसान सड़क हो या भीढ़ से भरा रेल '
    एक अन्य समाजिक सोच को दिखाती एक सुन्दर लेख // लिखते रहिये !!

  4. Anonymous says:

    Bhuwan Tiwari: Good job

  5. Anonymous says:

    Rubiyan Ghazi: उत्तम ,अति उत्तम

  6. Anonymous says:

    मनीष यादव: इस मोबाइल सिटी के बारे में पढ कर अच्छा लगा

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