शायद, ख्वाब संजोना याद है मुझको


अल्हड सा वो एक लडका, जो छुपकर देखा करता था..
शर्मीली सी वो एक लडकी, ख़्वाबों में खोई रहती थी...
कुछ सपने संजोए आँखों में, हम घर से निकला करते थे....
कंधे पर टाँगे बसते से हम, यूँही खेला करते थे|

बाहों में डाले बाहें, दिल की बातें करते थे..
कुछ नाराज़ से रहते थे, कुछ खोए-खोए रहते थे...
झूठे-मूठे गुस्से से, हर बात मनाया करते थे....
दो नैनों के यूँही हम, पेंच लड़ाया करते थे||

यारों की महफिलों में, न जाने क्या-क्या कहते थे..
अब तो बस ये यादें हैं, जिनमें बस फरियादें हैं...
नहीं दिखता अल्हड वो लडका, न ही वो शर्मीली सी....
यादों की परछाई है, दिल में भीनी-भीनी सी|

- भावना (its all about feelings)

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